बुध ग्रह
बुध सूर्य के सबसे पास का ग्रह है और द्रव्यमान से आंठवे क्रमांक पर है। बुध व्यास से गीनीमेड और टाईटन चण्द्रमाओ से छोटा है लेकिन द्रव्यमान मे दूगना है।
कक्षा : 57,910,000 किमी (0.38 AU) सूर्य से
व्यास : 4880किमी
द्रव्यमान :3.30e23 किग्रा
रोमन मिथको के अनुसार बुध व्यापार, यात्रा और चोर्यकर्म का देवता , युनानी देवता हर्मीश का रोमन रूप , देवताओ का संदेशवाहक देवता है। इसे संदेशवाहक देवता का नाम इस कारण मिला क्योंकि यह ग्रह आकाश मे काफी तेजी से गमन करता है।
बुध को ईसा से 3 सहस्त्राब्दि पहले सूमेरीयन काल से जाना जाता रहा है। इसे कभी सूर्योदय का तारा , कभी सूर्यास्त का तारा कहा जाता रहा है। ग्रीक खगोल विज्ञानियो को ज्ञात था कि यह दो नाम एक ही ग्रह के हैं। हेराक्लीटस यहां तक मानता था कि बुध और शुक्र पृथ्वी की नही, सूर्य की परिक्रमा करते है।
बुध पृथ्वी की तुलना मे सूर्य के समीप है इसलिये पृथ्वी से उसकी चन्द्रमा की तरह कलाये दिखायी देती है। गैलीलीयो की दूरबीन छोटी थी जिससे वे बुध की कलाये देख नही पाये लेकिन उन्होने शुक्र की कलायें देखी थी।
बुध ग्रह की मैसेन्जर यान द्वारा ली गयी तस्वीर
अभी तक दो अंतरिक्ष यान मैरीनर 10 तथा मैसेन्जर बुध ग्रह जा चूके है। मैरीनर- 10 सन 1974 तथा 1975 के मध्य तीन बार इस ग्रह की यात्रा कर चूका है। बुध ग्रह की सतह के 45% का नक्शा बनाया जा चुका है। (सूर्य के काफी समीप होने से हब्ब्ल दूरबीन उसके बाकी क्षेत्र का नक्शा नही बना सकती है।) मैसेन्जर यान 2004 मे नासा द्वारा प्रक्षेपित किया गया था। यह यान भविष्य मे 2011 मे बुध की परिक्रमा करेगा। इसके पहले जनवरी 2008 मे इस यान ने मैरीनर-10द्वारा न देखे गये क्षेत्र की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरे भेंजी थी।
बुध की कक्षा काफी ज्यादा विकेन्द्रीत(eccentric) है, इसकी सूर्य से दूरी 46,000,000 किमी(perihelion ) से 70,000,000 किमी(aphelion) तक रहती है। जब बुध सूर्य के नजदिक होता है तब उसकी गति काफी धिमी होती है। 19वी शताब्दि मे खगोलशास्त्रीयो ने बुध की कक्षा का सावधानी से निरीक्षण किया था लेकिन न्युटन के नियमो के आधार पर वे बुध की कक्षा को समझ नही पा रहे थे। बुध की कक्षा न्युटन के नियमो का पालन नही करती है। निरीक्षित कक्षा और गणना की गयी कक्षा मे अंतर छोटा था लेकिन दशको तक परेशान करनेवाला था। पहले यह सोचा गया कि बुध की कक्षा के अंदर एक और ग्रह (वल्कन) हो सकता है जो बुध की कक्षा को प्रभवित कर रहा है। काफी निरिक्षण के बाद भी ऐसा कोई ग्रह नही पाया गया। इस रहस्य का हल काफी समय बाद आईन्स्टाईन के साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत(General Theory of Relativity) ने दिया। बुध की कक्षा की सही गणना इस सिद्धांत के स्वीकरण की ओर पहला कदम था।
एक परिक्रमा के बाद बुध 1.5 गुना घुम चूका है, २ परिक्रमा के बाद वही गोलार्ध प्रकाशित होगा।
1962 तक यही सोचा जाता था कि बुध का एक दिन और वर्ष एक बराबर होते है जिससे वह अपना एक ही पक्ष सूर्य की ओर रखता है। यह उसी तरह था जिस तरह चन्द्रमा का एक ही पक्ष पृथ्वी की ओर रहता है। लेकिन डाप्लर सिद्धाण्त ने इसे गलत साबीत कर दिया। अब यह माना जाता है कि बुध के दो वर्ष मे तीन दिन होते है। अर्थात बुध सूर्य की दो परिक्रमा मे अपनी स्व्यं की तीन परिक्रमा करता है। बुध और मंडल मे अकेला पिंड है जिसका कक्षा/घुर्णन का अनुपात 1:1 नही है।(वैसे बहुत सारे पिंडो मे ऐसा कोई अनुपात ही नही है।)
बुध की कक्षा मे सूर्य से दूरी मे परिवर्तन के तथा उसके कक्षा/घुर्णन के अनुपात का बुध की सतह पर कोई निरिक्षक विचित्र प्रभाव देखेगा। कुछ अक्षांशो पर निरीक्षक सूर्य को उदित होते हुये देखेगा और जैसे जैसे सूर्य क्षितिज से उपर शीर्षबिंदू तक आयेगा उसका आकार बढता जायेगा। इस शीर्षबिंदू पर आकर सूर्य रूक जायेगा और कुछ देर विपरित दिशा मे जायेगा और उसके बाद फिर रुकेगा और दिशा बदल कर आकार मे घटते हुये क्षितिज मे जाकर सूर्यास्त हो जायेगा। इस सारे समय मे तारे आकाश मे सूर्य से तिन गुना तेजी से जाते दिखायी देंगे। निरीक्षक बुध की सतह पर विभिन्न स्थानो अलग अलग लेकिन विचित्र सूर्य की गति को देखेगा।
बुध की आंतरिक संरचना
बुध की सतह पर तापमान 90 डीग्री केल्वीन से 700डीग्री केल्वीन तक जाता है। शुक्र पर तापमान इससे गर्म है लेकिन स्थायी है।
बुध की सतह पर चन्द्रमा के जैसे क्रेटर (गडढे) है। बुध की सतह स्थायी है, उस पर परतो मे कोई गतिविधी नही है। बुध का घनत्व 5.43 ग्राम/सेमी है और यह पृथ्वी के बाद सबसे ज्यादा घनत्व वाला पिंड है। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण ज्यादा है जो घनत्व को बड़ा देता है अन्यथा बुध का घनत्व सबसे ज्यादा होता। इससे ऐसा प्रतित होता है कि बुध का लौह केन्द्र पृथ्वी के लौह केन्द्र से बड़ा है, शायद बाकि सभी ग्रहो के के केन्द्र से भी ज्यादा। बुध की सतह पर सीलीकेट की एक बारीक पपड़ी है।बुध के केन्द्र मे 1800 किमी से 1900 कीमी त्रीज्या की एक लोहे की गुठली है। सीलीकेट की परत (पृथ्वी जैसे ही) 500 किमी से 600 किमी मोटी है। सतह की पपड़ी 100 से 300 किमी की है। शायद लोहे का केन्द्र का कुछ भाग पिघला हुआ है।
कैलोरीस बेसीन
बुध पर एक हल्का वातावरण है जो मुख्यतः सौर वायु से आये परमाणुओ से बना है। बुध बहुत गर्म है जिससे ये परमाणु उड़कर अंतरिक्ष मे चले जाते है। ये पृथ्वी और शुक्र के विपरीत है जिसका वातावरण स्थायी है, बुध का वातावरण नविन होते रहता है।
बुध की सतह पर गढ्ढे काफी गहरे है, कुछ सैकड़ो किमी लम्बे और तीन किमी तक गहरे है। ऐसा प्रतित होता है कि बुध की सतह लगभग 0.1 % संकुचित हुयी है।बुध की सतह पर कैलोरीस घाटी है जो लगभग 1300किमी व्यास की है। यह चन्द्रमा के मारीया घाटी के जैसी है। शायद यह भी किसी धूमकेतु या क्षुद्रग्रह के टकराने से बनी है। इन गड्डो के अलाबा बुध ग्रह मे कुछ सपाट पठार भी है जो शायद भूतकाल के ज्वालामुखिय गतिविधीयो से बने है।
मैरीनर से प्राप्त आंकड़े बताते है कि बुध पर कुछ ज्वालामुखिय गतिविधीयां है लेकिन इसे प्रमाणित करने कुछ और आंकड़े चाहिये। आश्चर्यजनक रूप से बुध के उत्तरी ध्रुवो के गड्डो मे पानी की बर्फ के प्रमाण मीले है।
बुध पर हल्का सा चुंबकिय क्षेत्र है जो पृथ्वी के चुंबकिय क्षेत्र की क्षमता का 1% है। बुध का कोई भी ज्ञात चन्द्रमा नही है।
बुध सामान्यतः नंगी आंखो से सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से ठीक पहले देखा जा सकता है। बुध सूर्य के काफी समीप होने से इसे देखना मुश्किल होता है।
कुछ अनसुलझे प्रश्न
- बुध का घनत्व पृथ्वी के घनत्व के जैसा 5.43 ग्राम/सेमी ज्यादा है। लेकिन यह हमारे चंद्रमा से ज्यादा मिलता जूलता है। क्या किसी टक्कर से इसकी चट्टानें नष्ट हो गयी थी ?
- बुध की सतह पर लोहे की उपस्थिति नही है लेकिन इसकी कोर लोहे की बनी है। यह विचित्र है। क्या बुध अन्य चट्टानी ग्रहो से अलग है ?
- बुध के समतल पठार कैसे बने ?
- क्या बुध के उस हिस्से मे कुछ आश्चर्य छीपा है जिसे हम देख नही पाये है? कम गुणवत्ता की तस्वीरो मे ऐसा कुछ नही पाया है लेकिन ?