चन्द्रमा
चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है।
कक्षा : 384,400 किमी (पृथ्वी से)
व्यास: 3476 किमी
द्रव्यमान : 7.35e22 किग्रा
इसे रोमन लुना कहते थे, ग्रीको ने इसे सेलेन तथा आर्टेमीश नाम दिया था।
चन्द्रमा यह ऐतिहासिक रूप से ज्ञात आकाशिय पिंड है जो कि सूर्य के बाद सबसे चमकिला है। चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा महिने मे एक बार करता है और चन्द्रमा, पृथ्वी और सूर्य के बिच का कोण बदलते रहता है जिससे हमे चन्द्रमा की कलांये दिखायी देती है। दो पूर्णिमा (पूर्ण चन्द्रमा) के बिच का अंतराल 29.5 दिन(709 घंटे) है जो चन्द्रमा की पृथ्वी के परिक्रमा के समय से थोड़ा ज्यादा है।
चन्द्रमा का पृथ्वी की ओर का भाग
अपने आकार और बनावट के कारण चन्द्रमा को चट्टानीय ग्रहो (बुध,शुक्र,पृथ्वी और मंगल) ग्रहो की श्रेणी मे रखा जा सकता है। चंद्रमा अभी तक एक मात्र खगोलिय पिंड है जिस पर मानव कदम रख चुका है। चन्द्रमा पर पहला अंतरिक्षयान 1959 मे सोवियत संघ का लुना-2 था। पहला मानव अभियान 20 जुलाई 1969 का अपोलो 11था, जब नील आर्मस्ट्रांग और एडवीन आल्ड्रीन ने चन्द्रमा पर कदम रखे थे तथा अंतिम अभियान दिसंबर 1972 का था। चन्द्रमा एक मात्र खगोलिय पिंड है जिसके नमूने पृथ्वी पर लाये गये है।
पृथ्वी और चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण की रस्साकसी के कई विचित्र प्रभाव होते है जिसमे प्रमुख है समुद्रो मे आनेवाला ज्वार-भाटा। चन्द्रमा का गुरुत्व पृथ्वी की निकट्तम भाग पर ज्यादा होता है तथा विपरित भाग पर कम। पृथ्वी तथा विशेषतः समुद्रो पूरी तरह से ठोस ना होने चन्द्रमा की ओर की रेखा मे खिंच जाती है। इस कारण पृथ्वी पर हम दो छोटे उभार देख सकते है एक जो चन्द्रमा के ठीक सामने होता है दूसरा उस उभार के ठीक विपरित ओर। यह प्रभाव समुद्रो पर ठोस धरातल की तुलना मे ज्यादा होता है।पृथ्वी की घुर्णन गति, चन्द्रमा की परिक्रमा गति से ज्यादा होने से कारण ये दोनो उभार पृथ्वी के साथ घुमते है जिससे एक दिन मे दो ज्वार आते है। यह काफी सरल तरिके से बताया गया है, वास्तविक ज्वारभाटा जोकि समुद्रतटो पर आता है काफी जटिल प्रक्रिया है।
चन्द्रमा की पृथ्वी से विपरित ओर का भाग
पृथ्वी पूरी तरह से द्रव अवस्था मे भी नही है। पृथ्वी का घुर्णन पृथ्वी के इन उभारो को चन्द्रमा के ठीक निचे के बिंदू से थोड़ा आगे रखता है। इसका अर्थ यह है कि चन्द्रमा और पृथ्वी के बीच का यह आकर्षण बल उनके केन्द्रो के बीच की सरल रेखा मे नही होता है और इससे पृथ्वी पर टार्क(Tourque) उत्पन्न होता है जो चन्द्रमा को त्वरण प्रदान करता है। इस प्रभाव से पृथ्वी की घुर्णन गति हर शताब्दि मे 1.5 मीलीसेकंड कम हो रही है तथा चन्द्रमा की कक्षा मे 3.8 सेमी /वर्ष की बढोत्तरी हो रही है।(मंगल के उपग्रह फोबोस पर इसका उल्टा प्रभाव हो रहा है।)
इसी असममित गुरुत्वाकर्षण के कारण चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा समकालिक रूप से करता है अर्थात चन्द्रमा अपनी परिक्रमा और पृथ्वी की परिक्रमा लगभग समान समय मे करता है। इस कारण चन्द्रमा का केवल एक भाग ही पृथ्वी की ओर रहता है। जिस तरह आज चन्द्रमा पृथ्वी की घुर्णन गति को कम कर रहा है भूतकाल मे पृथ्वी ने चन्द्रमा की घुर्णन गति को कम किया है लेकिन यह प्रभाव कुछ ज्यादा शक्तिशाली था। जब चन्द्रमा की घुर्णन गति कम होकर परिक्रमा के काल के तुल्य हो गयी एक संतुलन कायम हो गया और एक स्थायी स्थिती बन गयी है। इसी तरह जब पृथ्वी की घुर्णन गति कम होकर चन्द्रमा की परिक्रमा काल के बराबर हो जायेगी तब पृथ्वी की घुर्णन गति मे गिरावट रूक जायेगी। यह प्रक्रिया सौर मंडल के अधिकतर ग्रहो और उपग्रहो मे हो चुकी है या हो रही है। प्लूटो और शेरान की की घुर्णन गति और उनके एक दूसरे के परिक्रमा का काल समान है और वे अब एक संतुलित स्थिति मे है।
चन्द्रमा की कलायें
चन्द्रमा पर वायूमंडल नही है। उपग्रहो और अंतरिक्षयानो से प्राप्त जानकारीयों के अनुसार चन्द्र्मा के ध्रुवो के पास के क्रेटरो मे पानी की बर्फ हो सकती है। चन्द्रमा की उपरी सतह की औसत मोटाई 68 किमी है यह मारे क्रिसीयम मे 0 किमी मोटी है वही कोरोलेव क्रेटर के उत्तर मे 107 किमी मोटी है। इस सतह के नीचे मैण्टल है और शायद एक छोटा केन्द्रक (300किमी व्यास तथा चन्द्रमा के कुल द्रव्यमान का 2%)। पृथ्वी के विपरित चन्द्रमा का आंतरिक भाग शांत है। आश्चर्यजनक रूप से चन्द्रमा का द्रव्यमान का केन्द्र(Center Of mass) भौगोलिक केन्द्र से 2 किमी दूर पृथ्वी की ओर है, साथ ही पृथ्वी की ओर वाली सतह पतली है।
चन्द्रमा पर दो तरह की भूभाग है , क्रेटरो से भरे उंचे पठार और समतल , नये मारीया। मारीया वास्तविक रूप से विशालकाय क्रेटर है जो ज्वालामुखिय लावा से समतल हो गये है। अधिकतर सतह उल्कापात से बनी धूल से ढंकी हुयी है। किसी अज्ञात कारण से अधिकतर मारीया पृथ्वी की ओर वाले हिस्से मे ही है। पृथ्वी की ओर के अधिकतर क्रेटरो का नाम वैज्ञानिको के नाम पर रखा गया है जैसे टायको, कोपरनिकस तथा टालेमीयस। पृथ्वी से परे सतह के नामकरण गागरीन, अपोलो, कोरोलेव किये गये है। एक क्रेटर एटीकन जो दक्षिण ध्रुव के पास है सौर मंडल मे सबसे बड़ा क्रेटर है; इसका व्यास 2250 किमी तथा गहराई 12 किमी है। ओरीयण्टाले क्रेटर एक कई वलयो वाला क्रेटर है।
पृथ्वी पर अपोलो और लुना अभियानो द्वारा 382 किग्रा चट्टानो के नमुने लाये गये है जो चन्द्रमा की सतह की जानकारी देते है। वैज्ञानिक आज भी इन नमुनो की जांच कर रहे है। चन्द्रमा की सतह पर की चट्टाने 4.6 अरब वर्ष से 3 अरब वर्ष पूरानी है जबकि पृथ्वी पर सबसे पूरानी चट्टानें 3 अरब वर्ष पूरानी है। चन्द्रमा की चट्टाने उस समय की जानकारी देती है जिसके बारे मे कोई सबूत पृथ्वी पर नही है।
चन्द्रमा की सतह पर आल्ड्रीन
अपोलो से लाये गये नमुनो से पहले चन्द्रमा की उत्पत्ति के बारे मे एकराय नही थी। मुख्यतः तीन मत थे। पहले मत के अनुसार पृथ्वी और चन्द्रमा एक ही साथ बने थे, दूसरे मतानुसार चन्द्रमा पृथ्वी का टूटा हुआ टुकड़ा है, तीसरे मतानुसार चन्द्रमा एक ग्रह था जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की चपेट मे आ गया। नयी जानकारीयो के अनुसार चन्द्रमा पृथ्वी की किसी अन्य मंगल ग्रह के बराबर वाले पिंड की टक्कर से उत्सर्जित पदार्थ से बना है। यह मत आज सर्वमान्य मत है।
चन्द्रमा पर चुंबकिय क्षेत्र नही है लेकिन कुछ चट्टानो पर इसके अवशेष है जो भूतकाल मे इसकी उपस्थिति दर्शाते है।
बिना कीसी वातावरण और चुंबकिय क्षेत्र के चन्द्रमा की सतह सौर वायू द्वारा क्षरित होते जा रही है। चन्द्रमा की सतह पर की धूल ने इस सौर वायू के आयनो का अवशोषण कीया है। इस धूल के नमुनो से सौर वायू के अध्यन मे काफी मदत हुयी है।