आयो
आयो बृहस्पति का पांचवा ज्ञात और तीसरा बड़ा उपग्रह है; यह गैलीलीयन चन्द्रमाओ मे सबसे अंदरूनी है। आयो पृथ्वी के चंद्रमा से थोड़ा बड़ा है।
कक्षा : 422,000किमी(बृहस्पति से)
व्यास : 3630 किमी
द्रव्यमान : 8.93 e33 किग्रा
आयो जीयस की अविवाहित प्रेमीका थी जिसे जीयस ने इर्ष्यालु हेरा के डर से बछीया बना दिया था।
आयो की खोज 1610मे गैलीलीयो ने की थी।
बाहरी सौर मंडल के अधिकतर चंद्रमाओ के विपरित आयो और युरोपा संरचना मे चट्टानी ग्रहो के जैसे है जो मुख्यतः पिघले सीलीकेट की चट्टानो से बने है। गैलीलीयो यान से प्राप्त जानकारी के अनुसार आयो का केन्द्रक लोहे का(शायद लोहे के सल्फाईड के मिश्रण के साथ) का है जिसकी त्रिज्या 900 किमी है।
आयो की सतह पर ज्वालामुखी
आयो की सतह सौर मंडल के किसी अन्य पिंड से अलग है। यह वायेजर अभियान से जुड़े विज्ञानीयो के लिये एक बड़ा आश्चर्य था। उन्हे आयो पर उल्का के टक्कर से बने क्रेटरो की उम्मीद थी जो अन्य ग्रहो और उपग्रहो पर है। लेकिन आयो पर इन क्रेटरो की संख्या उम्मीद से बहुत ही कम थी। इससे लगता है कि आयो की सतह एकदम नयी है।
वायेजर को क्रेटरो की जगह सैकड़ो ज्वालामुखी मीले जिनमे से कुछ सक्रिय है।वायेजर और गैलीलीयो अंतरिक्ष यानो ने आयो पर ज्वालामुखी विस्फोट और 300किमी तक उछली हुयी ज्वालाओ की हैरत अंगेज तस्वीरे भेजी है। वायेजर अभियानो की यह सबसे महत्वपुर्ण खोजो मे से एक थी जो इस तथ्य को प्रमाणित करती थी कि चट्टानी पिण्डो का आंतरिक भाग उष्ण और सक्रिय है। आयो के ज्वालामुखीयो से निकलता पदार्थ सल्फर या सल्फर डाय आक्साईड है। ज्वालामुखिय विस्फोट काफी तेजी से बदलते है। वायेजर 1 और वायेजर 2 अंतरिक्ष यानो के मध्य के कुछ महिनो मे ही कुछ ज्वालामुखी सक्रिय हो गये वही कुछ शांत हो गये थे। ज्वालामुखी के आसपास लावा का जमाव भी बदल गया था।
आयो की सतह पर के परिवर्तन
नासा की मौना की हवाइ(Mauna Kea Hawaii) पर स्थित अवरक्त दूरबीन से ली गयी तस्विरो के ने एक नये ज्वालामुखी विस्फोट को देखा है। हब्बल ने भी रा पटेरा के पास एक नये बदलाव को देखा है। गैलेलीयो की तस्वीरे भी वायेजर अभियान के बाद से आयो की सतह पर आये बदलाव दिखाती है। यह सभी निरिक्षण बताते है कि आयो की सतह काफी सक्रिय है।
आयो के भूभाग मे काफी विभिन्नताये है, यहां कई किलोमिटर गहरे ज्वालामुखी, पिघली गंधक की झीलें, पर्वत जो ज्वालामुखी नही है तथा सैकड़ो किमी लम्बी किसी द्रव (पिघली गंधक ?) की नदीयां है। आयो की सतह पर गधंक और उसके यौगिक कई सारे रंगो का प्रदर्शन करते है, जिससे आयो की सतह बहुरंगी दिखायी देती है।
आयो की आंतरिक संरचना
वायेजर से ली गयी तस्वीरो के अनुसार वैज्ञानिक मानते थे कि आयो की सतह पर लावा पिघली गंधक और उसके यौगिको का बना है। लेकिन बाद की अवरक्त तस्वीरो से पता चलता है कि पिघली गंधक के लिये लावा का तापमान कहीं ज्यादा है। ऐसा लगता है कि यह लावा पिघले सीलीकेट चट्टानो का हो सकता है। हब्बल दूरबीन के निरिक्षणो बताते है कि इस पदार्थ मे सोडीयम की मात्रा बहुतायत मे है या भिन्न जगहो पर भिन्न पदार्थ हो सकते है।
आयो पर कुछ गर्म जगहो का तापमा २००० केल्वीन तक है लेकिन औसत तापमान 130 केल्वीन है। इन गर्म जगहो से ही आयो अपनी उष्णता खोता है।
आयो,युरोपा और गीनीमेड की कक्षायें
आयो की सक्रियता के लिये आवश्यक उर्जा आयो, युरोपा गनीमीड और बृहस्पति के बीच ज्वारीय(गुरुत्विय) खिंचाव से प्राप्त होती है। यह तीनो चन्द्रमा बृहस्पति और एक दूसरे के गुरुत्व मे इस तरह फंसे है कि गनीमीड की एक बृहस्पति की एक परिक्रमा मे युरोपा की बृहस्पति की दो परिक्रमा होती है और आयो की चार। पृथ्वी के चन्द्रमा की तरह आयो की एक ही सतह बृहस्पति की ओर होती है लेकिन युरोपा और गनीमीड के आकर्षण से आयो थोड़ा डगमगाता है। इस डगमगाने से आयो की सतह 100 मीटर तक खींच जाती है(100 मीटर उंची ज्वार !)।
आयो बृहस्पति की चुंबकिय रेखाओ को काटता है, जिससे विद्युत धारा निर्मित होती है। यह ज्वारीय उष्णता की तुलना मे कम है लेकिन विद्युत धारा 1 ट्रीलीयन वाट तक हो सकती है। इसके कारण आयो का क्षरण भी होता है।
हाल ही के आंकड़ो से पता चलता है कि गिनिमेड और आयो का अपना चुंबकिय क्षेत्र है। आयो का एक पतला वातावरण है जो मुख्यतः सलफर डाय आक्साईड का बना है। अन्य गैलीलीयन चन्द्रमाओ के विपरित आयो पर पानी नही है। शायद यह बृहस्पति से आयो की निकटता से है, जिसने भूतकाल मे आयो से अपनी उष्णता द्वारा पानी को उड़ा दिया था।