पृथ्वी

पृथ्वी-अपोलो १७ द्वारा ली गयी तस्वीर

पृथ्वी-अपोलो १७ द्वारा ली गयी तस्वीर

पृथ्वी सूर्य से तीसरा और पांचवां सबसे बड़ा ग्रह है।

कक्षा 1.00: 149,600,000 किमी ( ए.यू. सूर्य से)

व्यास : 12,756.3 मी

द्रव्यमान : 5.972e24 किलो

पृथ्वी ग्रह अकेला ग्रह है जिसका  अंग्रेजी नाम ग्रीक / रोमन पौराणिक कथाओं से नहीं है।

पहले यह सोचा जाता था कि सारा ब्रम्हांड पृथ्वी की परिक्रमा करता है लेकिन कोपर्निकस (सोलहवीं सदी) के बाद यह समझ में आ गया है कि पृथ्वी सिर्फ एक ग्रह है।

ज़ाहिर है कि अंतरिक्ष यान की सहायता के बिना पृथ्वी का अध्ययन किया जा सकता है। फिर भी बीसवीं सदी तक पूरे ग्रह के नक्शे नही थे। अंतरिक्ष से ली गई है ग्रह की तस्वीरें काफी महत्व की हैं और वे असाधारण रूप से सुंदर हैं। अंतरिक्ष उपग्रहमौसम की भविष्यवाणी में एक विशाल मदद कर रहे हैं साथ ही  विशेष रूप से ट्रैकिंग और तूफान की भविष्यवाणी करने में।

पृथ्वी की संरचना

पृथ्वी की संरचना

पृथ्वी कई परतों में विभाजित है जो विशिष्ट रासायनिक और भूकंपी गुण से अलग अलग है  :

(गहराई किमी में है)

  1. 0-40 भूपटल
  2. 4-40 ऊपरी मैंटल
  3. 400-650 संक्रमण क्षेत्र
  4. 650-2700 अंत: मैंटल
  5. 2700-2890 डी परत
  6. 2890-5150बाह्य केन्द्रक
  7. 5150-6378 अंत: केन्द्रक

भूपटल वाली परत की मोटाई समान नही है, यह समुद्रो के तल पर पतली है तथा महाद्बीपो के निचे मोटी है। अंत: केण्द्रक तथा भूपटल ठोस है। बाह्य केन्द्रक तथा मैंटल परते अर्धद्रव है। पृथ्वी के द्रव्यमान का ज्यादातर मैंटल परत में है, बाकी का अधिकांश केन्द्रक में ,  वह हिस्सा जिसमे हम  निवास करते है इसका एक छोटा सा अंश है

  1. वातावरण =  0.0000051
  2. महासागर = 0.0014
  3. भूपटल = 0.026
  4. मैंटल =4.043
  5. बाहरी केन्द्रक = 1.835
  6. भीतरी केन्द्रक = 0.09675

(सभी x10 ^ 24 किलोग्राम मे)

केन्द्रक मुख्यतः लोहे(लोहा/निकेल) का बना है लेकिन हो सकता है कुछ हल्के तत्व भी मौजूद हो। केन्द्रक पर तापमान 7500 डीग्री केल्वीन है। अंतः मैंटल मुख्यतः सीलीकान , मैग्नेशीयम, आक्सीजन से बना है जिसमे कुछ लोहा, कैल्सीयम और अल्म्युनियम भी है। उपरी मैंटल सतह लौह और मैग्नेशीयम के सीलीकेट से बनी है। यह सब हम भूगर्भीय गतिविधियो से जानते है, ज्वालामुखी का लावा निचली परतो के नमूने उपर लाते रहता है। भूपटल सीलीकान डाय आक्साईड के क्रिस्टलो से बनी है।

पृथ्वी की रासायनिक संरचना :

  1. 34.6% आयरन
  2. 29.5% आक्सीजन
  3. 15.2% सिलिकन
  4. 12.7% मैग्नेशियम
  5. 2.4% निकेल
  6. 1.9% सल्फर
  7. 0.05% टाइटेनियम

धरती का घनत्व पूरे सौरमंडल मे सबसे ज्यादा है।

बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल (आकार के अनुपात मे)

बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल (आकार के अनुपात मे)

बाकी चट्टानी ग्रह की संरचना कुछ अंतरो के साथ पृथ्वी के जैसी ही है। चन्द्रमा का केन्द्रक छोटा है, बुध का केन्द्र उसके कुल आकार की तुलना मे विशाल है, मंगल और चंद्रमा का मैंटल कुछ मोटा है, चन्द्रमा और बुध मे रासायनिक रूप से भिन्न भूपटल नही है,सिर्फ पृथ्वी का अंत: और बाह्य मैंटल परत अलग है। ध्यान दे कि ग्रहो(पृथ्वी भी) की आंतरिक संरचना के बारे मे हमारा ज्ञान सैद्धांतिक ही है।

अन्य चट्टानी के विपरित पृथ्वी का भूपटल कुछ ठोस प्लेटो मे विभाजित है जो निचले द्रव मैंटल पर स्वतण्त्र रूप से बहते रहती है। इस गतिविधी को प्लेट टेक्टानिक कहते है।

पृथ्वी की मुख्य प्लेंटे

(वर्तमान में) आठ प्रमुख प्लेट:

  1. उत्तर अमेरिकी प्लेट – उत्तरी अमेरिका, पश्चिमी उत्तर अटलांटिक और ग्रीनलैंड
  2. दक्षिण अमेरिकी प्लेट – दक्षिण अमेरिका और पश्चिमी दक्षिण अटलांटिक
  3. अंटार्कटिक प्लेट – अंटार्कटिका और “दक्षिणी महासागर”
  4. यूरेशियाई प्लेट – पूर्वी उत्तर अटलांटिक, यूरोप और भारत के अलावा एशिया
  5. अफ्रीकी प्लेट – अफ्रीका, पूर्वी दक्षिण अटलांटिक और पश्चिमी हिंद महासागर
  6. भारतीय -आस्ट्रेलियाई प्लेट – भारत, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और हिंद महासागर के अधिकांश
  7. नाज्का प्लेट – पूर्वी प्रशांत महासागर से सटे दक्षिण अमेरिका
  8. प्रशांत प्लेट – प्रशांत महासागर के सबसे अधिक (और कैलिफोर्निया के दक्षिणी तट!)

पृथ्वी का भूपटल काफी नया है। खगोलिय पैमाने पर यह बहुत छोटे अंतराल 500,000,000 वर्ष मे बना है। क्षरण और टेक्टानीक गतिविधी पृथ्वी के भूपटल को नष्ट कर नया करते रहती है, इस तरक ऐतिहासिक भौगोलिक गतिविधियो के प्रमाण (क्रेटर)नष्ट होते रहते है। पृथ्वी के शुरुवाती इतिहास के प्रमाण नष्ट हो चुके है। पृथ्वी की आयु 4.5 अरब वर्ष से लेकर 4.6 अरब वर्ष है लेकिन पृथ्वी की सबसे पूरानी चट्टान 4 अरब वर्ष पूरानी है, 3 अरब वर्ष से पूराने चट्टाने दूर्लभ है। जीवित प्राणियो के जीवाश्म की आयु 3.9अरब वर्ष से कम है। जीवन के प्रारंभ के समय के कोई प्रमाण उपलब्ध नही है।
पृथ्वी की सतह का 70% हिस्सा पानी से ढंका है। पृथ्वी अकेला ग्रह है जिस पर पानी द्रव अवस्था मे सतह पर उपलब्ध है।(टाइटन पर द्रव इथेन या मिथेन हो सकती है, यूरोपा की सतह के नीचे द्रव पानी हो सकता है।) हम जानते है कि जीवन के लिये द्रव जल आवश्यक है। सागरो की गर्मी सोखने की क्षमता पृथ्वी के तापमान को स्थायी रखने मे महत्वपूर्ण है। द्रव जल पृथ्वी सतह के क्षरण और मौसम के लिये महत्वपूर्ण है।(मंगल पर भूतकाल मे शायद ऐसी गतिविधी हुयी हो सकती है।)

पृथ्वी के वातावरण मे 77% नायट्रोजन, 21% आक्सीजन,और कुछ मात्रा मे आर्गन,कार्बन डाय आक्साईड और जल बाष्प है। पृथ्वी पर निर्माण के समय  कार्बन डाय आक्साईड की मात्रा ज्यादा रही होगी जो चटटानो मे कार्बोनेट के रूप मे जम गयी, कुछ मात्रा मे सागर द्वारा अवशोषित कर ली गयी, शेष कुछ मात्रा जिवित प्राणियो द्वारा प्रयोग मे आ गयी होगी। प्लेट टेक्टानिक और जैविक गतिविधी कार्बन डाय आक्साईड का थोड़ी मात्रा का उत्त्सर्जन और अवशोषण करते रहते है। कार्बनडाय आक्साईड पृथ्वी के सतह का तापमान का ग्रीन हाउस प्रभाव द्वारा नियंत्रण करती है। ग्रीन हाउस प्रभाव द्वारा पृथ्वी सतह का तापमान 35 डिग्री सेल्सीयस होता है अन्यथा वह -21 डीग्री सेल्सीयस से 14 डिग्री सेल्सीयस रहता; इसके ना रहने पर समुद्र जम जाते और जिवन असंभव हो जाता। जल बाष्प भी एक आवश्यक ग्रीन हाउस गैस है।

रासायनिक दृष्टी से मुक्त आक्सीजन भी आवश्यक है। सामान्य परिस्थिती मे आक्सीजन विभिन्न तत्वो से क्रिया कर विभिन्न यौगिक बनाती है। पृथ्वी के वातावरण मे आक्सीजन का निर्माण और नियंत्रण विभिन्न जैविक प्रक्रियाओ से होता है। जिवन के बिना मुक्त आक्सीजन संभव नही है।

चन्द्रमा पृथ्वी के घुर्णन को अपने गुरुत्व से हर सदी मे २ मीलीसेकन्ड कम कर देता है। ताजा शोधो के अनुसार 90 करोड़ वर्ष पहले एक वर्ष मे 18 घंटो के 481 दिन होते थे।

पृथ्वी का चुंबकिय क्षेत्र(सौर वायू बायें से दायें बहती है)

पृथ्वी का चुंबकिय क्षेत्र(सौर वायू बायें से दायें बहती है)

पृथ्वी का अपना चुंबकिय क्षेत्र है जो कि बाह्य केन्द्रक के विद्युत प्रवाह से निर्मित  होता है। सौर वायू ,पृथ्वी के चुंबकिय क्षेत्र और उपरी वातावरण मीलकर औरोरा बनाते है। इन सभी कारको मे आयी अनियमितताओ से पृथ्वी के चुंबकिय ध्रुव गतिमान रहते है, कभी कभी विपरित भी हो जाते है।
पृथ्वी का चुंबकिय क्षेत्र और सौर वायू मीलकर वान एण्डरसन विकिरण पट्टा बनाते है, जो की प्लाज्मा से बनी हुयी डोनट आकार के छल्लो की जोड़ी है जो पृथ्वी के चारो की वलयाकार मे है। बाह्य पट्टा 19000 किमी से 41000किमी तक है जबकि अतः पट्टा 13000किमी से 7600 किमी तक है।

पृथ्वी के उपग्रह

पृथ्वी और चन्द्रमा(मंगल से खिंची तस्वीर)

पृथ्वी और चन्द्रमा(मंगल से खिंची तस्वीर)

पृथ्वी की एक ही प्राकृतिक उपग्रह है: चन्द्रमा

इसके अलावा हजारो की संख्या मे क्रत्रिम उपग्रह है।

क्षुद्रग्रह 3753 क्रुथेन और 2002ए ए29 पृथ्वी के साथी है। जो पृथ्वी के साथ सूर्य की परिक्रमा करते है।
दूरी मास त्रिज्या उपग्रह

(000 किमी) (किमी) (किलो)

——– ——— —— ——-

चाँद 1738 7.35e22 384

स्थलाकृतियां
पृथ्वी का तल असमान है। तल का 70.8 फीसदी भाग जल से आच्छादित है, जिसमें अधिकांश महासागरीय नितल समुद्री स्तर के नीचे है। धरातल पर कहीं विशाल पर्वत, कहीं ऊबड़-खाबड़ पठार तो कहीं पर उपजाऊ मैदान पाये जाते हैं। महाद्वीप और महासागरों को प्रथम स्तर की स्थलाकृति माना जाता है जबकि पर्वत, पठार, घाटी निचले स्तरों के अंतर्गत रखे जाते हैं।

पृथ्वी का तल भूवैज्ञानिक समय काल के दौरान प्लेट टेक्टोनिक्स और क्षरण की वजह से लगातार परिवर्तित होता रहता है। प्लेट टेक्टोनिक्स की वजह से तल पर हुए बदलाव पर मौसम, वर्षा, ऊष्मीय चक्र और रासायनिक परिवर्तनों का असर पड़ता है। हिमीकरण, तटीय क्षरण, प्रवाल भित्तियों का निर्माण और बड़े उल्का पिंडों के पृथ्वी पर गिरने जैसे कारकों की वजह से भी पृथ्वी के तल पर परिवर्तन होते हैं।

चट्टान
पृथ्वी की सतह से 16 किमी. की गहराई तक पृथ्वी की भूपर्पटी में पाए जाने वाले 95′ पदार्थ चट्टानों के रूप में पाए जाते हैं। इनकी रचना विभिन्न प्रकार के खनिजों का सम्मिश्रण है। विभिन्न आधारों पर किया चट्टानों का वर्गीकरण इस प्रकार है-
आग्नेय शैल (Igneous Rock) – आग्नेय शैल की रचना धरातल के नीचे स्थित तप्त एवं तरल मैग्मा के शीतलन के परिणामस्वरूप उसके ठोस हो जाने पर होती है। उदाहरण- माइका, ग्रेनाइट आदि।

अवसादी शैल (Sedimentary Rocks) – अपक्षय एवं अपरदान के  विभिन्न  साधनों द्वारा मौलिक चट्टानों के विघटन, वियोजन एवं चट्टान-चूर्ण के परिवहन तथा किसी स्थान पर जमाव के फलस्वरूप उसके अवसादों (debris) से निर्मित शैल को अवसादी शैल कहा जाता है। उदाहरण- कोयला, पीट, बालुका पत्थर आदि।

रूपांतरित शैल (Metamorphic rock)- अवसादी एवं आग्नेय शैलों में ताप एवं दबाव के कारण परिवर्तन या रूपांतरण हो जाने से रूपांतरित शैलों का निर्माण होता है। उदाहरण- संगमरमर, क्वाटर्जाइट आदि।

क्वाटर्ज, फेल्सपार, एम्फीबोल, माइका, पाइरोक्सिन और ऑलिविन जैसे सिलिकेट खनिज पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। पृथ्वी की सबसे बाहरी परत को पीडोस्फीयर कहते हैं। इस परत का निर्माण मृदा से हुआ है और इस स्तर पर लगातार मृदा उत्पादन की प्रक्रिया जारी रहती है। पृथ्वी पर स्थलमंडल का निम्नतम बिंदु मृत सागर है जिसकी गहराई समुद्र स्तर से 418 मी. नीचे है जबकि उच्चतम बिंदु माउंट एवरेस्ट है जिसकी समुद्री स्तर से ऊँचाई 8848 मी. है। स्थलमंडल की औसत ऊँचाई 840 मी. है।

महाद्वीप
पृथ्वी पर 7 महाद्वीप स्थित हैं-
एशिया- क्षेत्रफल – 44,614,000 वर्ग किमी.
एशिया सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह विश्व के कुल स्थल क्षेत्र के 1/3 भाग पर स्थित है।  यहाँ की 3/4 जनसंख्या अपने भरण-पोषण के लिए कृषि पर निर्भर है। एशिया चावल, मक्का, जूट, कपास, सिल्क इत्यादि के उत्पादन के मामले में पहले स्थान पर है।
अफ्रीका – क्षेत्रफल – 30,216,000 वर्ग किमी.
अफ्रीका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है। अफ्रीका का 1/3 हिस्सा मरुस्थल है। यहाँ की मात्र 10′ भूमि ही कृषियोग्य है। हीरे व सोने के उत्पादन में अफ्रीका सबसे ऊपर है।

उत्तर अमेरिका- क्षेत्रफल- 24,230,000 वर्ग किमी. यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह दुनिया के 16′ भाग पर स्थित है। कृषीय संसाधनों की दृष्टिïकोण से यह काफी धनी क्षेत्र है। विश्व के कुल मक्का उत्पादन का आधा उत्पादन यहीं होता है। वन, खनिज व ऊर्जा संसाधनों के दृष्टिïकोण से यह काफी समृद्ध क्षेत्र है।

दक्षिण अमेरिका– क्षेत्रफल- 17,814,000 वर्ग किमी. यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा महाद्वीप है। इस महाद्वीप का 2/3 हिस्सा विषुवत रेखा के दक्षिण में स्थित है। इसके बहुत बड़े हिस्से में वन हैं।

अंटार्कटिका- क्षेत्रफल- 14,245,000 वर्ग किमी. यह विश्व का पाँचवा सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह पूरी तरह दक्षिणी गोलाद्र्ध में स्थित है और दक्षिण ध्रुव इसके मध्य में स्थित है। इस महाद्वीप का 99′ हिस्सा वर्षपर्यन्त बर्फ से ढंका रहता है। यहाँ की भूमि पूरी तरह बंजर है।

यूरोप – क्षेत्रफल-10,505,000 वर्ग किमी. यूरोप एकमात्र ऐसा महाद्वीप है जहाँ जनसंख्या घनत्व अधिक होने के साथ-साथ समृद्धता भी है। यहाँ वन, खनिज, उपजाऊ मिट्टी व जल बहुतायत में है। यूरोप के महत्वपूर्ण खनिज संसाधन कोयला, लौह अयस्क, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस हैं।

ऑस्ट्रेलिया- क्षेत्रफल – 8,503,000 वर्ग किमी. यह एकमात्र देश है जो सम्पूर्ण महाद्वीप पर स्थित है। यह देश पादपों, वन्यजीवों व खनिजों के मामले में समृद्ध है लेकिन जल की यहाँ काफी कमी है।

पृथ्वी का भूगर्भिक इतिहास

वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 4.6 अरब वर्ष है। पृथ्वी के सम्पूर्ण भूगर्भिक इतिहास को निम्नलिखित कल्पों (Eras) में विभाजित किया जा सकता है-

पूर्व कैम्ब्रियन (Pre Cambrian Era) – इसी काल से पृथ्वी की शुरुआत हुई। यह कल्प लगभग 57 करोड़ वर्ष पूर्व समाप्त हुआ। इस कल्प के दौरान भूपर्पटी, महाद्वीपों व महासागरों इत्यादि का निर्माण हुआ और जीवन की उत्पत्ति भी इसी काल के दौरान हुई।

पुराजीवी काल (Palaeozoic Era)- 57 करोड़ वर्ष पूर्व से 22.5 करोड़ वर्ष तक विद्यमान इस कल्प में जीवों एवं वनस्पतियों का विकास तीव्र गति से हुआ। इस कल्प को निम्नलिखित शकों (Periods) में विभाजित किया गया है-

  • कैम्ब्रियन (Cambrian)
  • आर्डोविसियन (Ordovician)
  • सिल्यूरियन (Silurian)
  • डिवोनियन (Divonian)
  • कार्बनीफेरस (Carboniferous)
  • पर्मियन (Permian)

मेसोजोइक कल्प (Mesozoic era)- इस कल्प की अवधि 22.5 करोड़ से 7 करोड़ वर्ष पूर्व तक है। इसमें रेंगने वाले जीव अधिक मात्रा में विद्यमान थे। इसे तीन शकों में विभाजित किया गया है-

  • ट्रियासिक (Triassic)
  • जुरासिक (Jurassic)
  • क्रिटैशियस (cretaceous)

सेनोजोइक कल्प (Cenozoic era)– इस कल्प का आरंभ आज से 7.0 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था। इस कल्प में ही सर्वप्रथम स्तनपायी जीवों का आविर्भाव हुआ। इस युग को पाँच शकों में विभाजित किया गया है-

  • पैलियोसीन (Paleocene)
  • इयोसीन (Eocene)
  • ओलिगोसीन (Oligocene)
  • मायोसीन (Miocene)
  • प्लायोसीन (Pliocene)

इस युग में हिमालय, आल्प्स, रॉकीज, एण्डीज आदि पर्वतमालाओं का विकास हुआ।

नियोजोइक या नूतन कल्प (Neozoic Era) – 10 लाख वर्ष पूर्व से वर्तमान समय तक चलने वाले इस कल्प को पहले चतुर्थक युग (Quaternary Epoch) में रखकर पुन: प्लीस्टोसीन हिमयुग (Pleistocene) तथा वर्तमान काल जिसे होलोसीन (Holocene) कहा जाता है, में वर्गीकृत किया जाता है।

पर्वत
पर्वत धरातल के ऐसे ऊपर उठे भागों के रूप में जाने जाते हैं, जिनका ढाल तीव्र होता है और शिखर भाग संंकुचित क्षेत्र वाला होता है। पर्वतों का निम्नलिखित चार भागों में वर्गीकरण किया जाता है-
मोड़दार पर्वत (Fold Mountains) – पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों द्वारा धरातलीय चट्टानों में मोड़ या वलन पडऩे के परिणामस्वरूप बने हुए पर्वतों को मोड़दार अथवा वलित पर्वत कहते हैं। उदाहरण- यूरोप के आल्प्स, दक्षिण अमेरिका के एण्डीज व भारत की अरावली शृंखला।

अवरोधी पर्वत या ब्लॉक पर्वत (Block Mountains)- इन पर्वतों का निर्माण पृथ्वी की आंतरिक हलचलों के कारण तनाव की शक्तियों से धरातल के किसी भाग में दरार पड़ जाने के परिणामस्वरूप होता है। उदाहरण- यूरोप में ब्लैक फॉरेस्ट तथा वासगेस (फ्रांस) एवं पाकिस्तान में साल्ट रेंज।

ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic) – इन पर्वतों का निर्माण ज्वालामुखी द्वारा फेंके गए पदार्थों से होता है। उदाहरण- हवाई द्वीप का माउंट माउना लोआ व म्यांमार का माउंट पोपा ।

अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains) – इनका निर्माण विभिन्न कारकों द्वारा अपरदन से होता है। उदाहरण- भारत के अरावली, नीलगिरि आदि।

पठार
साधारणतया अपने सीमावर्ती धरातल से पर्याप्त ऊँचे एवं सपाट तथा चौड़े शीर्ष भाग वाले स्थलरूप को ‘पठार’ के नाम से जाना जाता है। इनके निम्नलिखित तीन प्रकार होते हैं-
अन्तरापर्वतीय पठार (Intermountane Plateau) – ऐसे पठार चारों ओर से घिरे रहते हैं। उदाहरण- तिब्बत का पठार, बोलीविया, पेरू इत्यादि के पठार।
पीडमॉण्ट पठार (Piedmont Plateau)- उच्च पर्वतों की तलहटी में स्थित पठारों को ‘पीडमॉण्ट’ पठार कहते हैं। उदाहरण – पीडमॉण्ट (सं. रा. अमेरिका), पेटागोनिया (दक्षिणी अमेरिका) आदि।
महाद्वीपीय पठार (Continental Plateau) – ऐसे पठारों का निर्माण पटल विरूपणी बलों द्वारा धरातल के किसी विस्तृतभू-भाग के ऊपर उठ जाने से होता है। उदाहरण- भारत के कैमूर, राँची तथा कर्नाटक के पठार।

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