सुंदरता और प्यार की देवी : शुक्र

शुक्र ग्रह

शुक्र ग्रह

शुक्र सूर्य से दूसरा ग्रह है और छठंवा सबसे बड़ा ग्रह है। शुक्र की कक्षा लगभग पूर्ण वृत्त है।
कक्षा :0.72 AU या 108,200,000 किमी ( सूर्य से)

व्यास : 12,103.6 किमी

द्रव्यमान : 4.869e24 किग्रा

शुक्र ग्रह सुंदरता और प्यार की देवी के नाम से जाना जाता है। (इसे यूनानी मे Aphrodite तथा बेबीलोन निवासी मे Ishtar कहते थे।) इसे यह नाम इस कारण दिया गया क्योंकि यह सबसे ज्यादा चमकिला ग्रह है।

शुक्र ग्रह को प्रागैतिहासिक काल से जाना जाता। यह सूर्य और चंद्रमा के अलावा आकाश में सबसे चमकदार पिंड है। बुध के जैसे ही इसे भी दो नामो भोर का तारा(यूनानी :Eosphorus ) और शाम का तारा के(यूनानी : Hesperus ) नाम से जाना जाता रहा है। ग्रीक खगोलशास्त्री जानते थे कि यह दोनो एक ही है।

गैलीलीयो ने दिखाया की शुक्र कलाये दिखाता है क्योकि वह सूर्य की परिक्रमा करता है।

गैलीलीयो ने दिखाया की शुक्र कलाये दिखाता है क्योकि वह सूर्य की परिक्रमा करता है।

शुक्र भी एक आंतरिक ग्रह है, यह भी चन्द्रमा की तरह कलाये प्रदर्शित करता है। गैलेलीयो द्वारा शुक्र की कलाओं के निरिक्षण कोपरनिकस के सूर्यकेन्द्री सौरमंडल सिद्धांत के सत्यापन के लिये सबसे मजबूत प्रमाण दिये थे।
1962 मे शुक्र ग्रह की यात्रा करने वाला पहला अंतरिक्ष यान मैरीनर2 था। उसके बाद 20से ज्यादा शुक्र ग्रह की यात्रा पर जा चूके हैं जिसमे पायोनियर विनस और सोवियत यान वेनेरा 7 है जो कि किसी दूसरे ग्रह पर उतरने वाला पहला यान था। वेनेरा 9 शुक्र की सतह की तस्वीरे भेजने वाला पहला यान था। अमरीका के यान मैगेलन ने शुक्र की कक्षा मे परिक्रमा करते हुये उसकी सतह का राडार की सहायता से पहला नक्शा बनाया था। युरोपियन अंतरिक्ष एजेण्सी का विनसएक्सप्रेस यान अभी शुक्र की कक्षा मे है।

शुक्र की एक ही सतह पृथ्वी से दिखायी देती है।

शुक्र की एक ही सतह पृथ्वी से दिखायी देती है।

शुक्र का घुर्णन विचित्र है, यह काफी धीमा है। इसका एक दिन 243 पृथ्वी के दिन के बराबर है जो कि शुक्र के एक वर्ष से कुछ ज्यादा है। शुक्र का घुर्णन और उसकी कक्षा कुछ इस तरह है कि शुक्र की केवल एक ही सतह पृथ्वी से दिखायी देती है।
शुक्र को पृथ्वी का जुंड़वा ग्रह कहा जाता है क्योंकि

  1. शुक्र पृथ्वी से थोड़ा ही छोटा है। यह ग्रह व्यास मे पृथ्वी के व्यास का 95% तथा द्रव्यमान मे पृथ्वी का 80% है।
  2. दोनो की सतह मे क्रेटर कम है और सतह अपेक्षाकृत नयी है।
  3. घनत्व तथा रासायनिक संरचना समान है।

इन समानताओ से यह सोचा जाता था कि बादलो के निचे शुक्र ग्रह पृथ्वी के जैसे होगा और शायद वहां पर जिवन होगा। लेकिन बाद के निरिक्षणो से ज्ञात हुआ कि शुक्र पृथ्वी से काफी अलग है और यहां जिवन की संभावना न्युनतम है।

शुक्र ग्रह पर दबाव पृथ्वी के वायुमंडल दबाव का 90 गुना है जोकि पृथ्वी पर सागरसतह से 1 किमी गहराई के तुल्य है। वातावरण मुख्यतः कार्बन डाय आक्साईड से बना है। यहां सल्फुरिक अम्ल के बादलो कई किलोमीटर मोटी कई परते है। यह बादल शुक्र ग्रह की सतह ढंक लेते है जिससे हम उसे देख नही पाते है। यह बादल ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा करते है जिससे शुक्र का तापमान 740डीग्री केल्वीन तक बड़ा देते है। शुक्र की सतह का तापमान बुध से ज्यादा है जबकि वह सूर्य से दूगनी दूरी पर है। शुक्र पर बादलो मे 350 किमी/घंटा की रफ्तार से हवा चलती है जो सतह पर अपेक्षाकृत धीमी (कुछ किमी /घंटा)है।शुक्र पर कभी पानी रहा होगा जो अब बास्पिकृत हो चूका है। शुक्र अब काफी सूखा ग्रह है। पृथ्वी भी शुक्र के जैसे ही होती यदि वह सूर्य से थोड़ा समीप होती।

मैगलेन द्वारा ली गयी तस्वीर

मैगलेन द्वारा ली गयी तस्वीर

शुक्र की सतह से अधिकांश रोलिंग मैदानों हैं। वहां काफी सारे समुद्र जैसे गहरे क्षेत्र है जैसे अटलांटा, गुयेनेवेरे,लावीनिया। कुछ उंचे पठारी क्षेत्र है जैसे ईश्तर पठार जो उत्तरी गोलार्ध मे है और आस्ट्रेलीया के आकार का है;अफ्रोदीते पठार जो भूमध्यरेखा पर है और दक्षिण अमरीका के आकार का है। इश्तर पठार का क्षेत्र उंचा है , इसमे एक क्षेत्र लक्ष्मी प्लेनम है जो शुक्र के पर्वतो से घीरा है। इनमे से एक महाकाय पर्वत मैक्सवेल मान्टेस है।

मैग्लेन यान से प्राप्त आंकड़े बताते है कि शुक्र की सतह का अधिकतर भाग लावा प्रवाह से ढंका है। उस पर काफी सारे मृत ज्वालामुखी है जैसे सीफ मान्स। हाल ही मे प्राप्त आंकड़े बताते है कि शुक्र अभी भी ज्वालामुखी सक्रिय है लेकिन कुछ ही क्षेत्रो मे; अधिकतर भाग लाखो वर्षो से शांत है।

शुक्र पर छोटे क्रेटर नही है। ऐसा प्रतित होता है कि उल्काये शुक्र के वातावरण मे सतह से टकराने से पहले ही जल जाती है। शुक्र की सतह पर क्रेटर गुच्छो मे है जो यह बताती है कि बड़ी उल्का सतह से टकराने से पहले छोटे टूकड़ो मे बंट जाती है।

शुक्र के प्राचीनतम क्षेत्र 8000लाख वर्ष पूराने है। ज्वालामुखीयो ने शुक्र के पुराने बड़े क्रेटरो को भर दिया है।

शुक्र का अंतरिक भाग पृथ्वी जैसा है, 3000 किमी त्रिज्या की लोहे का केन्द्र ;उसके आसपास पत्थर की परत। ताजा आंकड़ो के अनुसार शुक्र की पपड़ी ज्यादा मोटी और मजबूत है। पृथ्वी के जैसे ही शुक्र पर सतह पर दबाव बनता है और भूकंप आते है।
शुक्र का कोई चुंबकिय क्षेत्र नही है। शुक्र का कोई चन्द्रमा नही है।

आकाश मे शुक्र

आकाश मे शुक्र

शुक्र को नंगी आंखो से देखा जा सकता है। यह आकाश मे सबसे चमकिला पिंड है।

 

शुक्र पर अभियान

जहां औसत तापमान 460 डिग्री सेल्सियस है

हम जब भी अंतरिक्ष में जाने की बात करते हैं, हमारे मन में चंद्रमा पर जाने या फिर मंगल ग्रह पर जाने का ख़्याल सबसे पहले आता है। ये दोनों धरती के सबसे क़रीब जो हैं। मगर, एक और ग्रह जो धरती के क़रीब है वो है शुक्र। वहां जाने की ज़्यादा बात नहीं होती है।

लेकिन अब अमरीका और रूस के अलावा यूरोपीय देशों की स्पेस एजेंसी भी शुक्र ग्रह पर अभियान भेजने की तैयारी कर रही है।

शुक्र ग्रह, हमारे सौर मंडल के सबसे भयानक माहौल वाले ग्रहों में से एक है। ये पूरी तरह से गंधक के एसिड के बादलों से ढका है। यहां औसत तापमान 460 डिग्री सेल्सियस रहता है। यहां कार्बन डाई ऑक्साइड का दबाव धरती से नब्बे गुना ज़्यादा है। सीसा, ज़िंक और टिन जैसी धातुएं भी यहां पिघली हुई पाई जाती हैं। कार्बन डाई-आक्साइड यहां इतनी भारी होती है, जितनी सागर के एक किलोमीटर अंदर होती है। इतने दबाव में पनडुब्बियां भी तबाह हो जाती हैं।
मगर, बरसों बाद एक बार फिर शुक्र ग्रह में मानव की दिलचस्पी पैदा हुई है।

जापान ने अभी हाल ही में अकात्सुकी अभियान भेजा था, जो पिछले साल दिसंबर से शुक्र का चक्कर लगा रहा है। नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी भी 2020 तक शुक्र पर अपना अभियान भेजने की तैयारी कर रही हैं। यहां तक कि रूस भी शुक्र पर स्पेसक्राफ्ट भेजने का इरादा किए हुए है।

रूस ही वो पहला देश था जिसने सत्तर और अस्सी के दशक में शुक्र ग्रह पर वेनेरा और वेगा जैसे बेहद कामयाब अभियान भेजे थे।ये शुक्र का चक्कर लगाने के लिए भेजे गए थे। रूस इस बार भी शुक्र का चक्कर लगाने वाला अंतरिक्ष यान भेजने की तैयारी में है।

लेकिन, सिर्फ़ चक्कर लगाने वाले यान से बात नहीं बनेगी। शुक्र के माहौल को समझने के लिए एक अंतरिक्ष यान वहां उतारना होगा। यही सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि शुक्र ग्रह इतना गर्म है, वहां का माहौल इतना भयानक है कि कोई भी अंतरिक्ष यान उस माहौल में घंटे-दो घंटे भी नहीं टिक पाएगा। वैसे रूस के अभियान वेनेरा डी में एक स्पेसक्राफ्ट शुक्र के धरातल पर उतारने के लिए भी जाएगा। मगर ये वहां बमुश्किल तीन घंटे टिक पाए तो भी बड़ी बात है।
इससे पहले भी सोवियत संघ ने 1982 में वेनेरा 13 लैंडर, शुक्र पर उतारा था। ये कुल 127 मिनट तक बच सका। शुक्र के बेहद गर्म माहौल में ये उसके बाद जलकर राख हो गया।

वहां की भयंकर गर्मी, बेहद ख़तरनाक रसायन वाले वातावरण में किसी यान को दिन भर के लिए बचाए रखना वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। वो इतने वक़्त तक रुकेगा तभी वहां के माहौल का जायज़ा लेकर वहां की रिपोर्ट पृथ्वी पर भेज सकेगा। इसके लिए उसके अंदर के चिप, सर्किट, इलेक्ट्रॉनिक और इलेक्ट्रिक सिस्टम, इतने मज़बूत होने चाहिए कि वो वहां की भयंकर गर्मी में जल न जाएं। इस यान को बिना सूरज की रौशनी के काम करना होगा, क्योंकि शुक्र के आसमान पर हमेशा गंधक के बादलों का साया रहता है।

दिक़्क़त ये है कि अगर कोई बैटरी वाला अंतरिक्ष यान तैयार भी कर लिया जाए, तो वो इतनी देर तक चलेंगी नहीं और उनसे इतनी ऊर्जा भी पैदा नहीं हो सकती, जिससे कोई अंतरिक्ष यान देर तक काम कर सके।शुक्र पर भेजे जाने वाले अंतरिक्ष यान के लिए नासा एक अलग तरह की चीज़ से बनी कंप्यूटर चिप तैयार करने में जुटा है। ये ऐसा तत्व होना चाहिए जो 500 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी बचा रहे।

नासा के वैज्ञानिक गैरी हंटर कहते हैं कि कंप्यूटर का पूरा नया सिस्टम की गढ़ना होगा, जिसमें नए इंसुलेटर हों, नई वायरिंग, नई चिप। सब कुछ नया चाहिए। मगर हंटर के मुताबिक़, दिक़्क़त ये है कि तमाम तत्व, बेहद गर्म माहौल में अलग ही तरह का बर्ताव करते हैं। वो सिलिकॉन की मिसाल देते हैं, जो सेमीकंडक्टर है। मगर तापमान 300 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा होने पर, इसका बर्ताव अलग ही हो जाता है। फिर इसके ऊपर के तापमान में ये बचा भी रहेगा कि नहीं, कहना मुश्किल है।

गैरी हंटर बताते हैं कि नासा, सिलीकॉन और कार्बाइड से मिलकर बनने वाले एक पदार्थ से इलेक्ट्रॉनिक चीज़ें तैयार करने की सोच रहे हैं।उन्हें उम्मीद है कि ये तत्व, शुक्र ग्रह की भीषण गर्मी झेल जाएगा।
मगर दिक़्क़त ये है कि इस पदार्थ से डेटा गुज़ारने की रफ़्तार ठीक वैसी होगी जैसी साठ के दशक के कंप्यूटर्स की हुआ करती थी। शुक्र ग्रह पर जाने लायक अंतरिक्ष यान बनाने के लिए नए इंजन की भी ज़रूरत होगी।
इसके लिए 1816 में खोजी गई स्टर्लिंग तकनीक के प्रयोग की कोशिश की जा रही है। इंजन होगा तो इसके लिए ईंधन की भी ज़रूरत होगी। इंजन के विकास पर काम कर रहे वैज्ञानिक इसके लिए लीथियम को सही ईंधन मानते हैं। ये कार्बन डाई-ऑक्साइड और नाइट्रोजन के माहौल में भी जल सकता है। ये 180 डिग्री सेल्सियस पर पिघलता है। जो शुक्र ग्रह के माहौल के लिहाज़ से एकदम सटीक है। इसका वज़न भी कम होता है, जिससे शुक्र ग्रह पर भेजे जाने वाले यान का वज़न भी कम रहेगा।

फिलहाल इस दिशा में कई प्रयोग चल रहे हैं। नई चीज़ें विकसित करने की कोशिश हो रही है।लेकिन अभी कामयाबी हासिल करने के लिए बहुत काम किया जाना बाक़ी है।

शुक्र और हमारी पृथ्वी में कई समानताएं हैं। इनका आकार कमोबेश एक जैसा है। ये सूरज के एक ही हिस्से से अलग होकर ग्रह बने हैं। शुक्र ग्रह, धरती का 81 प्रतिशत माना जाता है। अब अगर मानव शुक्र के बारे में और जानकारी जुटा पाया तो, हम एक पहेली और हल कर सकेंगे कि आख़िर कैसे सूरज से एक साथ अलग होकर ग्रह बने धरती और शुक्र में इतना फ़र्क़ है। जहां धरती पर ज़िंदगी लहलहा रही है, वहीं, शुक्र का माहौल नर्क़ जैसा क्यों है?

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