Archive for ‘ग्रह’

दिसम्बर 1, 2011

विशालकाय, चमकिला

सबसे विशालकाय

सौर मंडल मे 17 पिंडो की त्रिज्या 1000 किमी से ज्यादा है।

नाम मातृ तारा/ग्रह दूरी (000किमी) व्यास किमी द्रव्यमान किग्रा
सूर्य 697000 1.99e30
बृहस्पति सूर्य 778000 71492 1.90e27
शनि सूर्य 1429000 60268 5.69e26
युरेनस सूर्य 2870990 25559 8.69e25*
नेपच्युन सूर्य 4504300 24764 1.02e26*
पृथ्वी सूर्य 149600 6378 5.98e24
शुक्र सूर्य 108200 6052 4.87e24
मंगल सूर्य 227940 3398 6.42e23
गनीमीड बृहस्पति 1070 2631 1.48e23+
टाईटन शनि 1222 2575 1.35e23+
बुध सूर्य 57910 2439 3.30e23+
कैलीस्टो बृहस्पति 1883 2400 1.08e23
आयो बृहस्पति 422 1815 8.93e22
चन्द्रमा पृथ्वी 384 1738 7.35e22
युरोपा बृहस्पति 671 1569 4.80e22
ट्राईटन नेपच्युन 355 1353 2.14e22
प्लूटो सूर्य 5913520 1160 1.32e22
  • * नेपच्युन युरेनस से थोड़ा ज्यादा घना है।
  • +बुध गनीमीड तथा टाईटन से ज्यादा घना है।

सबसे घना

11 पिंडो का घनत्व 3 ग्राम/घन सेमी से ज्यादा है।

नाम त्रिज्या (किमी) द्रव्यमान (kg) घनत्व(ग्राम/घन सेमी)
पृथ्वी 6378 5.97e24 5.52
बुध 2439 3.30e23 5.42
शुक्र 6052 4.87e24 5.26
आद्रस्टीआ 10 1.91e16 4.5
मंगल 3398 6.42e23 3.94
आयो 1815 8.93e22 3.53
चन्द्रमा 1738 7.35e22 3.34
एलारा 38 7.77e17 3.3
सीनोपे 18 7.77e16 3.1
लीस्थीआ 18 7.77e16 3.1
युरोपा 1569 4.80e22 3.01

सबसे ज्यादा चमकिला

१२ पिंडो की चमक ६ से ज्यादा है(पृथ्वी के संदर्भ मे), इन्हे नंगी आंखो से या बायनाकुलर से देखा जा सकता है।

नाम मातृ ग्रह/तारा दूरी(000किमी) त्रिज्या(km) Vo*
सूर्य ? 0 697000 -26.8
चन्द्रमा पृथ्वी 384 1738 -12.7
शुक्र सूर्य 108200 6052 -4.4
बृहस्पति सूर्य 778000 71492 -2.7
मंगल सूर्य 227940 3398 -2.0
बुध सूर्य 57910 2439 -1.9
शनि सूर्य 1429000 60268 0.7
गनीमीड बृहस्पति 1070 2631 4.6
आयो बृहस्पति 422 1815 5.0
युरोपा बृहस्पति 671 1569 5.3
युरेनस सूर्य 2870990 25559 5.5
कैलीस्टो बृहस्पति 1883 2400 5.6
फ़रवरी 9, 2011

नेपच्युन

नेपच्युन

नेपच्युन

नेपच्युन सूर्य का आंठवा और चौथा सबसे बड़ा(व्यास से) ग्रह है। नेपच्युन युरेनस से व्यास के आधार पर छोटा लेकिन द्रव्यमान के आधार पर बड़ा ग्रह है।
कक्षा : 4,504,000,000 किमी(30.06 AU) सूर्य से
व्यास : 49,532 किमी(विषुवत पर)
द्रव्यमान :1.0247e26 किग्रा

रोमन मिथको के अनुसार नेपच्युन सागर का राजा है, इसे ग्रीक मे पासीडान कहा जाता है।

नेपच्युन पहला ग्रह है जिसके होने की भविष्यवाणी गणितिय आधार पर की गयी थी और इसे गणना की गयी जगह पर खोज निकाला गया। युरेनस की खोज के बाद यह पाया गया कि उसकी कक्षा न्युटन के नियमो का पालन नही करती थी। जिससे यह अनुमान लगाया गया कि कोई अन्य ग्रह युरेनस की कक्षा को प्रभावित कर रहा है। एडम्स और ले वेरीएर ने स्वतंत्र रूप से बृहस्पति, शनि और युरेनस की स्थिति के आधार पर नेपच्युन के स्थान की गणना की। गाले और डीअरेस्ट ने 23सितंबर 1846को नेपच्युन की गणना किये गये स्थान के निकट खोज निकाला। इस खोज के श्रेय के लिये एडम्स और ले वेरीयर के मध्य अंतरराष्ट्रिय विवाद उत्पन्न हो गया। जिसे इस खोज का श्रेय दिया जाता उसे इस ग्रह के नामकरण का अधिकार मिलता। अब इन दोनो विज्ञानियो को इस ग्रह की खोज का श्रेय दिया जाता है। बाद के निरिक्षणो से पता चला की एडम्स और ले वेरीयर द्वारा गणना की गयी कक्षा से नेपच्युन विचलित हो जाता है और उनके द्वारा गणना किये गये स्थान पर नेपच्युन का पाया जाना एक संयोग था।

नेपच्युन का आकार(पृथ्वी की तुलना मे)

नेपच्युन का आकार(पृथ्वी की तुलना मे)

इसके दो सौ वर्ष पहले 1613मे गैलेलीयो ने नेपच्युन बृहस्पति के समीप देखा था लेकिन उसे एक तारा समझ कर उपेक्षित कर दिया था। लगातार दो रातो को गैलेलीयो ने इसे पास के एक तारे के संदर्भ मे अपने स्थान से विचलित होते देखा था, बाद की रातो मे वह गैलेलियो की दूरबीन से दृश्यपटल से ओझल हो गया था। ध्यान दे कि आकाश मे केवल ग्रह ही गति करते नजर आते है, तारे अपने स्थान पर ही रहते है। यदि गैलेलीयो ने इसके पहले की कुछ रातो को नेपच्युन को देखा होता तब उन्हे इसकी गति नजर आ जाती और नेपच्युन की खोज का श्रेय गैलेलीयो को जाता। लेकिन दुःर्भाग्य से बादलो के छाये रहने से गैलेलीयो उन रातो को आकाश का निरिक्षण नही कर पाया था।

नेपच्युन की यात्रा केवल एक ही अंतरिक्ष यान वायेजर 2 ने की है। नेपच्युन के बारे मे अधिकतर जानकारी इस यान द्वारा दी गयी है लेकिन हब्बल और अन्य वेधशालाओ ने भी इस ग्रह के बारे मे जानकारी जुटायी है।

प्लूटो की कक्षा नेपच्युन की कक्षा को काटती है। इससे कभी कभी वह कुछ वर्षो तक नेपच्युन की कक्षा के अंदर भी रहता है।

१. उपरी वातावरण,२. हायड्रोजन, हीलीयम, मिथेन का वातावरण,३.पानी, मिथेन, अमोनिया से बना भूपटल , ४.बर्फ और चट्टानो से बना केंद्रक

१. उपरी वातावरण,२. हायड्रोजन, हीलीयम, मिथेन का वातावरण,३.पानी, मिथेन, अमोनिया से बना भूपटल , ४.बर्फ और चट्टानो से बना केंद्रक

नेपच्युन की संरचना युरेनस के जैसी है। यह मुख्यतः चट्टान और विभिन्न तरह की बर्फ से बना है जिसमे 15% हायड्रोजन और थोड़ी हीलीयम है। यह बृहस्पति और शनि के विपरित है जो मुख्यतः हायड़्रोजन से बने है। युरेनस और नेपच्युन मे बृहस्पति और शनि के विपरित परतदार आंतरिक संरचना नही है और उसमे पदार्थ समान रूप से वितरित है। इनके केन्द्र मे पृथ्वी के आकार का चट्टानी केन्द्रक है।

नेपच्युन के वातावरण मे 83% हायड्रोजन, 15% हीलीयम और 2% मिथेन है।

नेपच्युन का निला रंग उसके वातावरण मे उपरी भाग मे स्थित मिथेन द्वारा लाल रंग के अवशोषण के कारण है लेकिन किसी अन्य अज्ञात तत्व की मौजूदगी से इसके बादलो को गहरा निला रंग मीला है।

अन्य गैस महाकाय ग्रहो की तरह नेपच्युन पर बादलो के पट्टे है जो तेज गति से बहते है। नेपच्युन  पर पूरे सौर मंडल मे सबसे तेज गति से 2000किमी/प्रति घंटा तक की गति से हवायें चलती है।

नेपच्युन भी युरेनस और बृहस्पति की तरह सूर्य से प्राप्त उर्जा से ज्यादा उर्जा उत्सर्जित करता है।

बड़ा गहरा धब्बा, द स्कूटर और छोटा गहरा धब्बा

बड़ा गहरा धब्बा, द स्कूटर और छोटा गहरा धब्बा

वायेजर 2 ने नेपच्युन के दक्षिणी गोलार्ध पर  एक बड़ा गहरा धब्बा देखा था। यह बृहस्पति के महाकाय लाल धब्बे के आकार से आधा था। इस धब्बे मे पश्चिम की ओर की दिशा मे हवा 300 मी/सेकंड की गति से बह रही थी। वायेजर 2 ने दक्षिणी गोलार्ध एक और छोटा धब्बा और एक अनियमित आकार का सफेद बादल देखा था। यह सफेद आकार का धब्बा 16 घंटे मे नेपच्युन की परिक्रमा कर रहा था, इसे ’द स्कूटर’ नाम दिया गया था।

1994 मे हब्बल दूरबीन ने पाया कि यह महाकाय धब्बा अदृश्य हो चूका था। शायद यह तूफान शांत हो गया है या वातावरण की किसी और गतिविधी से दब गया है। कुछ महिनो बाद हब्बल ने उत्तरी गोलार्ध मे एक नया धब्बा देखा। यह प्रदर्शित करता है कि नेपच्युन का वातावरण तेजी से बदलता है, शायद वातावरण के बादलो की उपरी और निचली सतह मे तापमान के परिवर्तन से।

अन्य गैस ग्रहो की तरह नेपच्युन के भी वलय है। बृहस्पति की तरह ये वलय गहरे रंग के है। पृथ्वी से यह वलय टूटे हुये(चाप के जैसे) दिखते है लेकिन वायेजर की तस्विरो मे यह पूरे है। इसमे से एक वलय मुड़े हुये आकार का है। सबसे बाहरी वलय का नाम एडम्स है जिसके तीन मुख्य चाप लिबर्टी, इक्विलिटी तथा फ्रेटर्नीटी है, इसके बाद का वलय अनामित है जो चन्द्रमा गैलेटीआ का समकक्षी है। इसके बाद का वलय लेवेरीएर है जिसके दो सहवलय लासेल और आर्गो है। अंत मे एक धूंधला लेकिन चौड़ा वलय गाले है।

नेपच्युन का चुंबकिय क्षेत्र युरेनस के जैसे विचित्र रूप से निर्देशित है।

नेपच्युन कभी कभी नंगी आंखो से देखा जा सकता है लेकिन बाइनाकुलर या छोटी दूरबीन से इसे आसानी से देखा जा सकता है।

नेपच्युन के चन्द्रमा

नेपच्युन और उसके चन्द्रमा(प्रोटेउस उपर, लारीसा निचे दाएं, डेस्पीना बायें): हब्बल से लिया चित्र

नेपच्युन और उसके चन्द्रमा(प्रोटेउस उपर, लारीसा निचे दाएं, डेस्पीना बायें): हब्बल से लिया चित्र

नेपच्युन के १३ ज्ञात चन्द्रमा है।

उपग्रह दूरी (000किमी) व्यास (किमी) द्रव्यमान(किग्रा) आविष्कारक वर्ष
नाएड Naiad 48 29 ? वायेजर २ 1989
थैलसा Thalassa 50 40 ? वायेजर २ 1989
डेस्पीना Despina 53 74 ? वायेजर २ 1989
गालेटीआ Galatea 62 79 ? वायेजर २ 1989
लारीसा Larissa 74 96 ? वायेजर २ 1989
प्राटेउस Proteus 118 209 ? वायेजर २ 1989
ट्राईटन Triton 355 1350 2.14e22 लासेल 1846
नेरीड Nereid 5509 170 ? काईपर 1949
हालीमेडे Halimede 15728 61 ? 2002
साओ Sao 22422 40 ? 2002
लावोमीडीआ Laomedeia 23571 40 ? 2002
सामथे Psamathe 46695 38 ? 2003
नेसो Neso 48387 60 ? 2002

नेपच्युन के वलय

नेपच्युन के वलय(वायेजर २ से लिया चित्र)

वलय दूरी (किमी) चौड़ाई (किमी) दूसरा नाम
डीफ्युज Diffuse 41900 15 1989N3R,गाले Galle
अंदरूनी Inner 53200 15 1989N2R,लेवेरीएर LeVerrier
प्लैटेउ Plateau 53200 5800 1989N4R,लासेल आर्गो Lassell,Arago
मुख्य Main 62930 <50 1989N1R,एडम्स Adams
फ़रवरी 8, 2011

युरेनस

युरेनस- वायेजर २ से लिया चित्र

युरेनस- वायेजर २ से लिया चित्र

युरेनस सूर्य का सांतवा तथा तीसरा सबसे बड़ा(व्यास से) ग्रह है। युरेनस नेपच्युन से आकार मे बड़ा लेकिन द्रव्यमान से छोटा है।
कक्षा : 2,870,990,000 किमी(19.218 AU)सूर्य से
व्यास :51,118किमी (विषुवत वृत्त पर)
द्रव्यमान : 8.683e25 किग्रा

ग्रीक मिथक कथाओ मे युरेनस स्वर्ग का राजा है। युरेनस गैया का पति और क्रोनस(शनि), सायक्लोप्स तथा टाईटन का पिता है।

युरेनस आधिनिक काल मे खोजा जाने वाला पहला ग्रह है जिसे विलियम हर्शेल ने 13 मार्च 1781 को अपनी दूरबीन से खोजा था। इसे इसके पहले भी देखा गया था लेकिन उसे तारा समझ कर उपेक्षित किया गया। 1600 मे जोन फ्लेमस्टीड ने उसे 34 टौरी के नाम से तारे के रूप मे वर्गीकृत किया था। खगोलशास्त्री बोडे ने ग्रीक मिथको के देवताओ के नाम पर ग्रहो के नामकरण की परंपरानुसार इसे युरेनस नाम दिया।

वायेजर 2 ने 24 जनवरी 1986 को युरेनस की यात्रा की थी।

युरेनस अपने वलय, चन्द्रमा और अक्षांशो पर विभिन्न रंगो के पट्टे के साथ

युरेनस अपने वलय, चन्द्रमा और अक्षांशो पर विभिन्न रंगो के पट्टे के साथ

अधिकतर ग्रह सौरमंडल के प्रतल के लम्बवत घुर्णन करते है लेकिन युरेनस का घुर्णन अक्ष इसके समांतर है। जिससे यह प्रतित होता है कि यह ग्रह सुर्य की परिक्रमा लुढकते हुये कर रहा है। जब वायेजर २ यान ने इसकी यात्रा की थी तब इसका दक्षिणी ध्रुव सूर्य की ओर था। इसके अक्ष के इस तरह झुके रहने से इसके ध्रुवो को विषुवत रेखिय क्षेत्रो से ज्यादा सूर्य उर्जा प्राप्त होती है। लेकिन युरेनस अपने विषुवत पर ध्रुवो की तुलना मे ज्यादा गर्म है जिसका कारण अज्ञात है।

युरेनस के इस तरह झुके होने से इसके उत्तरी ध्रुव के निर्धारण की भी समस्या है। इसके लिये या तो अक्ष का झुकाव ९० डीग्री से ज्यादा और परिक्रमा की दिशा घड़ी की सुइयो के विपरित होना चाहीये या अक्ष का झुकाव ९० डीग्री से कम और परिक्रमा की दिशा घड़ी की सुइयो की दिशा मे होना चाहिये।

युरेनस की संरचना

युरेनस की संरचना

युरेनस मुख्यतः चट्टान और विभिन्न तरह की बर्फ से बना है जिसमे १५% हायड्रोजन और थोड़ी हीलीयम है। यह बृहस्पति और शनि के विपरित है जो मुख्यतः हायड़्रोजन से बने है। युरेनस और नेपच्युन का केन्द्रक कुछ हद तक शनि और बृहस्पति के केन्द्रक जैसा है लेकिन धात्विक द्रव हायड़्रोजन की परत नही है। यह प्रतित होता है कि युरेनस का केन्द्रक शनि और बृहस्पति की तरह चटटानी नही है और उसमे पदार्थ समान रूप से वितरित है।

युरेनस के वातावरण मे 83% हायड्रोजन, 15% हीलीयम और 2% मिथेन है।

अन्य गैस महाकाय ग्रहो की तरह युरेनस पर बादलो के पट्टे है जो तेज गति से बहते है। लेकिन यह पट्टे काफी धुंधले है जिन्हे वायेजर 2 के चित्रो मे कठीनायी से देखा जा सकता है। हब्बल ले कुछ चित्रो मे मे ये पट्टे स्पष्ट दिखायी देते है। हब्बल के कुछ और निरिक्षणो इस पर सक्रियता दिखायी दी है। युरेनस पर मौसमी प्रभाव से अंतर दिखायी पढता है।

युरेनस का निला रंग उसके वातावरण मे उपरी भाग मे स्थित मिथेन द्वारा लाल रंग के अवशोषण के कारण है। बृहस्पति के जैसे विभिन्न रंगो के पट्टे मौजूद हो सकते है लेकिन वे उपरी वातावरण मे मौजूद मिथेन द्वारा ढंके हुये है।

अन्य गैस ग्रहो की तरह युरेनस के भी वलय है। बृहस्पति की तरह ये वलय गहरे रंग के है लेकिन शनि की तरह वे बारीक धूलकणो से लेकर 10मिटर तक के चट्टानो से बने है। युरेनस के 13 ज्ञात वलय है, सभी धूंधले है, सबसे चमकदार एप्सीलान वलय है। शनि के बाद युरेनस के वलय सबसे पहले देखे गये थे। यह एक महत्वपूर्ण खोज थी क्योंकि अब हम जानते है कि सभी गैस ग्रहो  के वलय होते है; शनि का इसमे एकाधिकार नही है।

वायेजर 2 ने युरेनस के 10 छोटे चन्द्रमा खोजे थे जो पहले से खोजे गये 5 बड़े चन्द्रमाओ के अतिरिक्त है। इसके वलयो मे कुछ छोटे और चन्द्रमाओ के होने की उम्मीद है।

युरेनस कभी कभी नंगी आंखो से देखा जा सकता है लेकिन बाइनाकुलर या छोटी दूरबीन से इसे आसानी से देखा जा सकता है।

युरेनस के चन्द्रमा

युरेनस के चन्द्रमा आकार की तुलना मे

युरेनस के चन्द्रमा आकार की तुलना मे

  • युरेनस के 27 ज्ञात चन्द्रमा है
  • युरेनस के चन्द्रमा के नाम ग्रीक मिथको पर आधारित ना होकर शेक्सपियर और पोप की रचनाओ पर है|
  • इनके 2 समूह है, वायेजर द्वारा खोजे गये 11 छोटे अंदरूनी चन्द्रमा और 5 बड़े चन्द्रमा।
  • अधिकतर चन्द्रमा युरेनस के विषुवत के प्रतल पर युरेनस की परिक्रमा करते है जिससे वे सौर मंडल के प्रतल पर लम्बवत होते है।
चन्द्रमा दूरी (000किमी) व्यास किमी द्रव्यमान(किग्रा) आविष्कारक वर्ष
कार्डेलीया Cordelia 50 13 ? वायेजर २ 1986
ओफेलीया Ophelia 54 16 ? वायेजर २ 1986
बीनाका Bianca 59 22 ? वायेजर २ 1986
क्रेसीडा Cressida 62 33 ? वायेजर २ 1986
डेस्डेमोना Desdemona 63 29 वायेजर २ 1986
जूलीयट Juliet 64 42 ? वायेजर २ 1986
पोर्टीआ Portia 66 55 ? वायेजर २ 1986
रोजालिंड Rosalind 70 27 ? वायेजर २ 1986
क्युपिड Cupid 75 6 ? Showalter 2003
बेलींडा Belinda 75 34 ? वायेजर २ 1986
पेरडीटा Perdita 76 40 ? वायेजर २ 1986
पक Puck 86 77 ? वायेजर २ 1985
मैब Mab 98 8 8? शोवाल्टर Showalter 2003
मिरान्डा Miranda 130 236 6.30e19 क्वीपर Kuiper 1948
एरीयल Ariel 191 579 1.27e21 लासेल Lassell 1851
अम्ब्रीएलUmbriel 266 585 1.27e21 लासेल Lassell 1851
टाईटनीया Titania 436 789 3.49e21 हर्शेल Herschel 1787
ओबेरान Oberon 583 761 3.03e21 हर्शेल Herschel 1787
फ्रान्सीस्को Francisco 4281 6? शेफर्ड Sheppard 2003
कालीबान Caliban 7169 40 ? ग्लैडमन Gladman 1997
स्टीफनो Stephano 7948 15? ग्लैडमन Gladman 1999
ट्राइन्कुलो Trinculo 8578 5? हालमन Holman 2001
सायकोरेक्स Sycorax 12213 80 ? निकल्सन Nicholson 1997
मार्गरेट Margaret 14689 6? ? शेफर्ड Sheppard 2003
प्रोसपेरो Prospero 16568 20? हाल्मन Holman 1999
सेटेबोस Setebos 17681 20 ? काबेलार्स Kavelaars 1999
फर्डीनाण्ड Ferdinand 21000 6 शेफर्ड Sheppard 2003
युरेनस के वलय

युरेनस के वलय

युरेनस के वलय

वलय दूरी(किमी) चौड़ाई(किमी)
1986U2R 38000 2,500
6 41840 1-3
5 42230 2-3
4 42580 2-3
अल्फा Alpha 44720 7-12
बीटा Beta 45670 7-12
ईटा Eta 47190 0-2
गामा Gamma 47630 1-4
डेल्टा Delta 48290 3-9
1986U1R 50020 1-2
एप्सीलान Epsilon 51140 20-100
जनवरी 28, 2011

शनि

शनि (कासीनी से ली गयी तस्वीर)

शनि (कासीनी से ली गयी तस्वीर)

शनि सूर्य से छंठा ग्रह है और बृहस्पति के बाद सबसे बड़ा ग्रह है।

 

कक्षा : 1,429,400,00 किमी (9.54 AU) सूर्य से

व्यास: 120,536किमी (विषुवत वृत्त पर)

द्रव्यमान: 5.68e26 किग्रा

रोमन मिथको के अनुसार शनि कृषि का देवता है। शनि से जुड़ा ग्रीक देवता क्रोनस युरेनस तथा गैया का बेटा तथा जीयस का पिता है। शनि से शनिवार बना है।  बेबीलोन के देवता नीनुरता तथा हिन्दू देवता शनि भी शनि ग्रह से जुड़े है।

शनि प्रागऐतिहासिक काल से ज्ञात ग्रह है। गैलीलीयो ने इसे दूरबीन से पहली बार 1610 मे देखा था। उन्होने शनि के विचित्र आकार को देखा था और मजाक मे कहा था कि शायद शनि के दो कान भी है। बाद मे यह पता चला था कि शनि का यह विचित्र आकार उसके वलयो के कारण है।

शनि के शुरुवाती निरिक्षण उस समय जटिल हो गये थे जब शनि के चित्र उसके आकार को भिन्न समय पर अलग अलत तरह से दिखाते थे। यह इस कारण होता था कि कुछ वर्षो के अंतराल मे पृथ्वी शनि के वलय के प्रतल से गुजरती है, उस समय शनि के वलय ठीक से दिखायी नही देते है। 1659 मे क्रिस्टीयन हायजेन्स ने शनि के वलय की ज्यामिति का सही अनुमान लगाया। 1977 तक शनि अपने वलयो के कारण सबसे अलग माना जाता था, लेकिन 1977 मे युरेनस के आसपास एक पतला वलय पाया गया। अब हम जानते है कि वलय गैस ग्रहो(बृहस्पति, शनि,युरेनस और नेपच्युन) का सामान्य गुण है।

पायोनियर 11ने 1979 मे पहली बार शनि की यात्रा की थी, उसके पश्चात वायेजर 1 , वायेजर 2 ने शनि की यात्रा की थी। कासीनी अभियान जुलाई 2004 मे शनि के पास पहुंचा था और चार वर्ष शनि की कक्षा मे रहा है।

शनि और पृथ्वी का तुलनात्मक आकार

शनि और पृथ्वी का तुलनात्मक आकार

शनि अपने विषुवतवृत्त पर चपटा है, उसके विषुवत वृत्त के व्यास और ध्रुविय व्यास मे 10%(120,536 किमी तथा 108,728 किमी) का अंतर है। यह शनि के तेज घुर्णन तथा द्रव अवस्था के कारण है। बाकि गैस ग्रह भी विषुवत वृत्त पर चपटे है लेकिन शनि की तुलना मे कम है।

शनि का घनत्व अन्य ग्रहो से कम है, यह पानी के घनत्व का 0.7 भाग है। शनि का घनत्व पृथ्वी के घनत्व का 1/8 भाग है जबकि शनि का व्यास पृथ्वी से 9 गुणा है।

बृहस्पति की तरह शनि 75% हायड्रोजन और 25% हिलीयम से बना है जिसमे जल, मिथेन, अमोनिया और चट्टानो के कुछ अंश है। यह प्राथमिक सौर निहारिका जिससे सौर मंडल का जन्म हुआ के समान है।

शनि का आंतरिक भाग भी बृहस्पति के जैसा है जिसमे चट्टानी केन्द्रक और उसके आसपास द्रव धात्त्विक हायड़ोजन की परत उसके बाहर आण्विक हायड्रोजन की परत है। विभिन्न तरह की बर्फ (पानी, कार्बन डाय आक्साईड, मिथेन इत्यादि) के कुछ अंश भी पाये गये है।

शनि के केन्द्र का तापमान 12000 केल्वीन है और शनि सूर्य से जितनी उर्जा ग्रहण करता है उससे ज्यादा उत्सर्जित करता है। यह उर्जा शनि के गुरुत्विय संपिड़न से उत्पन्न होती है। लेकिन यह शनि की चमक को समझने के लिये काफी नही है, शायद शनि मे कोई और प्रक्रिया भी चल रही है जो कि शनि के आंतरिक भाग से बाहर की ओर हिलीयम के प्रवाह से भी हो सकती है।
बृहस्पति की तुलना मे वायू के प्रवाह से बने पट्टे शनि पर धुंधले है और वे विषुवत पर ज्यादा चौड़े है। शनि के बादलो के उपर की विस्तृत जानकारी वायेजर से पहले अज्ञात थी। शनि पर भी बृहस्पति के जैसे धब्बे है जो कि विशालकाय चक्रवात है। 1990 मे हब्बल दूरबीन द्वारा विषुवत पर एक चक्रवात देखा गया जो कि वायेजर अभियान के समय नही था। 1994 मे हब्बल ने एक नया छोटा चक्रवात भी देखा।

शनि और सूर्य के मध्य औसत दूरी 1400,000,000किमी (9 AU) है। 9.69 किमी/सेकंड की औसत गति से शनि सूर्य की परिक्रमा करने के लिये पृथ्वी के 29.5 वर्ष(पृथ्वी के 10759दिन) लेता है। शनि की कक्षा पृथ्वी की कक्षा से 2.48 डिग्री झुकी हुयी है। शनि की कक्षा दिर्घवृत्ताकार है और 0.056 इसेन्ट्रीसीटी होने से उसकी सूर्य से दूरी मे 155,000,000किमी का अंतर आता है।

शनि के वलय

शनि के वलय

शनि के वलय

शनि के वलयो मे से दो मुख्य वलय ‘ए’ तथा ‘बी’ , एक धुंधला वलय ‘सी’ पृथ्वी से देखे जा सकते है। वलय ‘ए’ तथा वलय ‘बी’ के मध्य के रिक्त स्थान को कासीनी डीवीजन कहा जाता है। ए वलय के बाहर एक छोटा और धुंधला रिक्त स्थान को एन्के डीवीजन कहा जाता है। वायेजर अभियान ने शनि के और भी धूंधले वलयो की खोज की थी। अन्य ग्रहो की तुलना मे शनि के वलय चमकिले है(अलबीडो 0.2-0.6)।

शनि के वलय पृथ्वी से ठोस दिखायी देते है लेकिन ये वलय छोटे छोटे कणो से बने है जो अपनी अपनी स्वतंत्र कक्षा मे है। इन कणो का आकार कुछ सेमी से लेकर कुछ मीटर तक है। कुछ किलोमीटर चौड़े पिंड भी संभव है।

शनि के वलयो का व्यास 250,000किमी और ज्यादा है लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वे पतले है। उनकी मोटाई १ किमी से भी कम है। शनि के वलयो मे उसकी विशालता की तुलना मे पदार्थ काफी कम है। शनि के वलयो के प्रभावशाली उपस्थिति के बावजूद यदि शनि के वलयो के पदार्थ को किसी एक पिंड के रूप मे संपिडित किया जाये तो उसका आकार 100 किमी से ज्यादा नही होगा।

वलय के कण जल बर्फ के बने है लेकिन इसमे चट्टानो के बर्फ आवरण वाले टूकड़े भी है।

वायेजर यानो ने इन वलयो के मध्य स्पोक जैसे आकृतिया भी देखी है। स्पोक जैसी ये आकृतिया एक रहस्य है लेकिन इसका कारण शनि का चुंबकिय क्षेत्र हो सकता है।

शनि का बाह्य एफ वलय एक जटिल संरचना है जिसमे बहुत सारे छोटे वलय है साथ मे इन छोटे वलयो को बांधने वाली गांठे भी है। वैज्ञानिको के अनुसार ये गांठे वलय पदार्थ का ढेर या छोटे चन्द्रमा हो सकते है।

शनि के चन्द्रमाओ और वलयो मे एक जटिल ज्वारिय बंध है। कुछ गड़रिये चन्द्रमा (एटलस, प्रामेथीयस और पेंडोरा) इन वलयो को अपने स्थान पर बनाये रखते है। मीमास कासीनी डीवीजन को पदार्थ से मुक्त रखता है(यह क्षुद्रग्रहो के पट्टे मे कीर्कवुड गैप के जैसे है)। पान चन्द्रमा एन्के डीवीजन के मध्य है जबकि S/2005 S1 कीलर गैप के मध्य है। यह सम्पूर्ण वलय प्रणाली काफी जटिल है और हम इसे पूरी तरह से समझ नही पाये है।

शनि के वलय (अन्य ग्रहो के भी) के बनने के कारण अज्ञात है। वलय प्रणाली अस्थायी होती है, इन्हे बनाये रखने के लिये कोई प्रक्रिया चाहीये। यह शायद बड़े चन्द्रमाओ के टूटने से होता है। शनि के वर्तमान वलय केवल कुछ हजार लाख वर्ष पूराने ही है।

शनि का भी मजबूत चुंबकिय क्षेत्र है।

रात्री आकाश मे शनि को खुली आंखो से देखा जा सकता है। यह बृहस्पति के जैसा चमकदार तो नही लेकिन इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। इसके वलय और बड़े चन्द्रमा छोटी दूरबीन से देखे जा सकते है।

शनि के चन्द्रमा

2010 तक शनि के 62 ज्ञात चन्द्रमा है।

शनि के चन्द्रमाओ का कोलाज

शनि के चन्द्रमाओ का कोलाज

इसके चंद्रमा तीन युग्मो मे मीमास-टेथीस, एनलेडस-डीयोने और टाईटन-हायपेरीओन गुरुत्वाकर्षण से बंधे है जिससे वे अपनी कक्षाओ मे एक स्थायी रिश्ता रखते है। मीमास का परिक्रमा काल टेथीस से आधा है, दूसरे शब्दो मे वे 1:2 के अनुनाद मे है, एनलेडस-डीयोने 1:2 के अनुनाद मे और टाईटन-हायपेरीओन 3:4 के अनुनाद मे है।

शनि के मुख्य चन्द्रमा

चन्द्रमा शनि से दूरी (000 किमी) व्यास(किमी) द्रव्यमान(किग्रा) आविष्कारक दिनांक
पैन Pan 134 10 ? शोवाल्टर Showalter 1990
एटलस Atlas 138 14 ? टेर्रीले Terrile 1980
प्रामेथीउस Prometheus 139 46 2.70e17 कालींस Collins 1980
पैन्डोरा Pandora 142 46 2.20e17 कालीन्स Collins 1980
एपीमेथीउस Epimetheus 151 57 5.60e17 वाकर Walker 1980
जानुस Janus 151 89 2.01e18 डाल्फ़स Dollfus 1966
मीमास Mimas 186 196 3.80e19 हर्शेल Herschel 1789
एन्क्लेडस Enceladus 238 260 8.40e19 हर्शेल Herschel 1789
टेथीस Tethys 295 530 7.55e20 कासीनी Cassini 1684
टेलीस्टो Telesto 295 15 ? रेट्सेमा Reitsema 1980
केलीप्सो Calypso 295 13 ? पास्कु Pascu 1980
डीओने Dione 377 560 1.05e21 कासीनी Cassini 1684
हेलेने Helene 377 16 ? लाक्स Laques 1980
रीआ Rhea 527 765 2.49e21 कासीनी Cassini 1672
टाईटन Titan 1222 2575 1.35e23 हायजेन्स Huygens 1655
हायपेरीओन Hyperion 1481 143 1.77e19 बांड Bond 1848
आयपेटस Iapetus 3561 730 1.88e21 कासीनी Cassini 1671
फोबे Phoebe 12952 110 4.00e18 पिकरिंग Pickering 1898

शनि के वलय

नाम त्रिज्या (आंतरिक) त्रिज्या (बाह्य) चौड़ाई स्थिति द्रव्यमान(किग्रा)
डी वलय D-Ring 67,000 74,500 7,500 वलय
गुरिन डीवीजन GuerinDivision विभाजक
सी वलय C-Ring 74,500 92,000 17,500 वलय 1.1e18
मैक्सवेल डीवीजन MaxwellDivision 87,500 88,000 500 (विभाजक)
बी वलय B-Ring 92,000 117,500 25,500 (वलय) 2.8e19
कासीनी डीवीजन CassiniDivision 115,800 120,600 4,800 (विभाजक)
हायजेन्स गैप HuygensGap 117,680 (n/a) 285-440 (विभाजक)
ए वलय A-Ring 122,200 136,800 14,600 (वलय) 6.2e18
एन्के मीनीमा EnckeMinima 126,430 129,940 3,500 29%-53%
एन्के डीवीजम EnckeDivision 133,410 133,740 विभाजक
कीलर गैप KeelerGap 136,510 136,550 विभाजक
एफ वलय F-Ring 140,210 30-500 (वलय)
जी वलय G-Ring 165,800 173,800 8,000 (वलय) 1e7?
ई वलय E-Ring 180,000 480,000 300,000 (वलय)


जनवरी 24, 2011

देवताओ का गुरु

बृहस्पति

बृहस्पति

बृहस्पति सूर्य से पांचवा और सबसे बड़ा ग्रह है। यह महाकाय ग्रह बाकी सभी ग्रहो के कुल द्रव्यमान का दूगुना है। बृहस्पति का द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का ३१८ गुणा है।

कक्षा : 778,330,000 किमी (5.20 AU) सूर्य से

व्यास : 142,948 किमी(विषुवतवृत्त पर)

द्रव्यमान : 1.900e27 किग्रा

बृहस्पति हिन्दू मिथको के अनुसार देवताओ के गुरू है। जूपिटर रोमन मिथको के अनुसार क्रोनस(शनि) के बेटे और देवताओ के राजा, ओलम्पस के सम्राट तथा रोमन साम्राज्य के रक्षक है। ग्रीक मिथको मे वे जीयस है।

बृहस्पति आकाश मे चौथे क्रमांक(सूर्य, चन्द्रमा और शुक्र के बाद) पर सबसे चमकिला पिंड है। इस ग्रह को भी ऐतिहासिक रूप से जाना जाता रहा है। 1610 मे गैलीलीयो ने पहली बार इसे दूरबीन से देखा था और इसके चार सबसे बड़े चन्द्रमा आयो,युरोपा, गनीमीड और कैलीस्टो की खोज की थी। इन चन्द्रमाओ को अब गैलीलीयन चन्द्रमा कहते है। यह पहली खोज थी कि सभी आकाशिय पिंडो की गति का केन्द्र पृथ्वी नही है। यह एक ऐसा मुद्दा था जो कोपरनिकस के सूर्य केन्द्रित सिद्धांत जो समर्थन देता था, साथ मे शुक्र की कलाये का सबूत भी था। गैलीलीयो द्वारा कोपरनिकस के खुले समर्थन ने उन्हे चर्च के विरोध मे खड़ा कर दिया जिसकी सजा उन्हे भूगतनी पड़ी थी। आज कोई भी एक साधारण दूरबीन या बायनाकुलर से गैलीलीयो के निरिक्षण का सत्यापन कर सकता है।

बृहस्पति तक जाने वाला पहला अंतरिक्ष यान पायोनियर 10था जो 1973 मे बृहस्पति तक पहुंचा था, उसके पश्चात पायोनियर 11, वायेजर 1, वायेजर 2, और युलीसीस यान इस ग्रह तक पहुंचे। गैलीलीयो यान 8 वर्षो तक बृहस्पति की कक्षा मे रहा और अब भी यह ग्रह हब्बल दूरबीन के निरिक्षण मे रहता है।

इस गैसीय महाकाय की ठोस सतह नही है, इसका गैसीय द्रव्य का घनत्व गहराई के साथ बढ़ता जाता है। इन गैसीय ग्रहो का व्यास या त्रिज्या उस बिन्दू से मापा जाता है जहां दबाव १ वायुमंडलीय दबाव होता है। जब हम इस ग्रह की तस्वीरे देखते है वह इन ग्रहो के उपर के बादलो की तस्वीरे होती है जो १ वायुमंडलीय दबाव के क्षेत्र  से थोड़े उपर होते है।

बृहस्पति ग्रह 90% हायड़्रोजन और 10% हीलीयम से बना है, कुछ मात्रा मे मिथेन, पानी , अमोनिया और चट्टानो का चूरा है। यह प्राथमिक सौर निहारीका के मिश्रण के जैसे ही है जिससे सौर मंडल बना है। शनि की संरचना भी कुछ ऐसे ही है लेकिन नेपच्युन और युरेनस मे हायड़्रोजन और हीलीयम काफी कम है।

बृहस्पति(तथा अन्य गैस ग्रहो) की आंतरिक संरचना के बारे मे हमारी जानकारी अप्रत्यक्ष तरिके से प्राप्त की गयी है। गैलीलीयो यान द्वारा प्राप्त जानकारी गैस के बादलो से १५० किमी निचे तक की ही है।

बृहस्पति की आंतरिक सरंचना (चट्टानी केन्द्रक, द्रव धातु हायड़्रोजन)

बृहस्पति की आंतरिक सरंचना (चट्टानी केन्द्रक, द्रव धातु हायड़्रोजन)

बृहस्पति का शायद चट्टानी क्रेन्द्रक(Core) है जो पृथ्वी के द्रव्यमान का 10-15 गुणा हो सकता है। इस क्रेन्द्रक के उपर मुख्य रूप से द्रव धातुयी हायड़्रोजन है। यह द्रव धातुयी हायड़्रोजन 40 लाख बार दबाव पर ही हो सकती है। इतना ज्यादा दबाव बृहस्पति या शनि के केन्द्र मे ही हो सकता है। इस अवस्था मे हायड्रोजन आयोनाइज्ड प्रोटान और इलेक्ट्रान के रूप मे होती है। सूर्य मे भी हायड्रोजन ऐसे ही होती है लेकिन काफी कम तापमान पर। इस तापमान और दबाव पर बृहस्पति के केन्द्र के आसपास हायड्रोजन द्रव अवस्था मे होती है और विद्युत आवेश, चुंबकिय क्षेत्र की वाहक होती है। इस परत मे शायद कुछ हीलीयम और अन्य बर्फ(जल बर्फ नही) भी हो सकती है।

सबसे बाहरी परत मे साधारण आण्विक हायड्रोजन और हीलीयम है; हीलीयम  अन्दर द्रव और बाहर गैस के रूप मे होती है। हम जो वातावरण देख पाते है वह इस परत का सबसे बाहरी हिस्सा है। इस हिस्से मे पानी, कार्बन डाय आक्साईड, मिथेन और अन्य आसान अणु भी अत्यल्प मात्रा मे है।

बृहस्पति के वायुमंडल मे बादलो की तीन परते होने का अनुमान है जो अमोनिया की बर्फ, अमोनियम हायड्रोसल्फाईड और बर्फ पानी के मिश्रण की है। गैलीलीयो यान के अनुसार पानी की मात्रा अनुमान से कम है। उम्मीद थी कि बृहस्पति का वातावरण मे सूर्य के जैसे दूगनी मात्रा मे आक्सीजन होगी लेकिन आक्सीजन की मात्रा कम पायी गयी।  इसके अलावा आश्चर्यजनक रूप से वातावरण के उपरी भाग का तापमान और घनत्व ज्यादा पाया गया।

बृहस्पति पर वायू के पट्टे और लाल महाकाय धब्बा

बृहस्पति पर वायू के पट्टे और लाल महाकाय धब्बा

बृहस्पति और अन्य गैसीय ग्रहों मे उच्च गति से हवा चलती है जो अक्षांशो के पट्टे मे बहती है। एक दूसरे से सटे पट्टो मे ये हवाये विपरित दिशाओ मे बहती है। विभिन्न पट्टो मे तापमान और रासायनिक सरचना मे अंतर हर पट्टे को एक अलग रंग देती है जो कि इन ग्रहो को एक निश्चीत रंग रूप प्रदान करता है। बृहस्पति के इन पट्टो को कुछ समय से जाना जाता रहा है लेकिन इन पट्टो की सीमा पर स्थित कुछ जटिल चक्रवातो को पहली बार वायेजर से देखा गया। गैलीलीयो यान द्वारा प्राप्त आंकड़ो के अनुसार हवाये उम्मीद से ज्यादा तेज 400मील प्रति घंटा की गति से बहती है। इन हवाओ की गहराई हजारो किलोमीटर तक हो सकती है। बृहस्पति की हवाये सूर्य से प्राप्त उर्जा की बजाये आंतरिक उर्जा से बहती है। पृथ्वी मे हवाये सूर्य से प्राप्त गर्मी के कारण बहती है।

बृहस्पति के बादलो के विभिन्न रंग विभिन्न तत्वो की रासायनिक प्रतिक्रियाओ के कारण है, मुख्यतः गंधक के यौगिको से जो विभिन्न रंगो के होते है।

बृहस्पति का महाकाय लाल धब्बा पृथ्वी से पिछले 300वर्षो से कुतुहुल का विषय रहा है। यह लाल धब्बा एक 12000x 25000किमी का अंडाकार क्षेत्र है जो 2 पृथ्वीयो को समा सकता है। कुछ अन्य छोटे लेकिन ऐसे ही धब्बे दशको से देखे गये है। अवरक्त किरणो के निरिक्षण और घुर्णन की दिशा से पता चलता है ये महाकाय लाल धब्बा एक उच्च दबाव क्षेत्र है जिसके बादल कुछ ज्यादा ही उंचे और आसपास के क्षेत्रो से ठंडे है। ऐसे ही क्षेत्र शनि और नेपच्युन पर भी देखे गये है। यह अभी तक अज्ञात है कि ये उच्च दबाव के क्षेत्र इतने लम्बे समय तक कैसे बने रहते है।

बृहस्पति सूर्य से जितनी उर्जा प्राप्त करता है उससे ज्यादा उर्जा उत्सर्जित करता है। बृहस्पति  का आंतरिक भाग गर्म है, केन्द्रक का तापमान शायद 20000 डिग्री केल्वीन है जोकि गुरुत्विय संपिड़ण से उत्पन्न है। बृहस्पति सूर्य के जैसे नाभिकिय संलयन से उर्जा नही बना सकता है क्योंकि गुरुत्विय संपिड़ण से प्राप्त उर्जा  नाभिकिय संलयन प्रारंभ करने के लिये पर्याप्त नही है। केन्द्र की यह उर्जा बृहस्पति से बाहर नही निकल पाती है और बादलो के जटिल प्रवाह को नियंत्रित करती है। शनि और नेपच्युन बृहस्पति  के जैसे ही है लेकिन युरेनस कुछ अलग है।

बृहस्पति और पृथ्वी (आकार की तुलना)

बृहस्पति और पृथ्वी (आकार की तुलना)

बृहस्पति अपने व्यास मे उतना ही बड़ा है जितना एक गैस ग्रह हो सकता है। यदि उसमे और द्रव्यमान डाला जाये तब भी वह गुरुत्विय संपिडण से उतना ही बड़ा रहेगा। एक तारा इससे ज्यादा बड़ा अपने आतंरिक (नाभिकिय उर्जा) उर्जा श्रोत से ही इससे बड़ा हो सकता है। लेकिन बृहस्पति को तारा बनने के लिये अपने द्रव्यमान से 80 गुणा ज्यादा द्रव्यमान चाहीये।

बृहस्पति का एक विशाल चुंबकिय क्षेत्र है जोकि पृथ्वी के चुंबकिय क्षेत्र से कहीं ज्यादा शक्तिशाली है। इसका चुंबकिय क्षेत्र 65 करोड़ किमी(शनि की कक्षा से बाहर तक) फैला हुआ है। बृहस्पति के चंद्रमा उसके चुंबकिय क्षेत्र के अंदर ही है। इस चुंबकिय क्षेत्र के कारण बृहस्पति के वातावरण मे कुछ उच्च उर्जायुक्त कण फंसे रह जाते है जो की अंतरिक्ष यानो, अंतरिक्ष यात्रीयो को हानी पहुंचा सकते है। यह पृथ्वी के वान एलन पट्टे के जैसा ही है लेकिन काफी उच्च क्षमता का और मानव के लिये घातक है।

गैलीलीयो यान ने बृहस्पति के वलय और वातावरण के मध्य एक और विकिरण पट्टे का पता लगाया है जो वान एलन पट्टे से 10 गुणा ज्यादा शक्तिशाली है। आश्चर्यजनक रूप से इस पट्टे मे अज्ञात श्रोत वाले उच्च उर्जा वाले हीलीयम आयन है।

बृहस्पति के वलय

बृहस्पति के वलय

बृहस्पति  के भी शनि के जैसे वलय है लेकिन ये वलय पतले और छोटे है। वायेजर1 द्वारा इनकी खोज अप्रत्याशित रूप से हुयी थी। शनि के विपरित बृहस्पति  के वलय गहरे है(0.05 अल्बिडो). ये शायद चट्टानी धूल के छोटे कणो से बने है। शनि के वलयो के विपरित इन वलयो मे बर्फ नही है।

बृहस्पति आकाश मे एक चमकिले पिंड के जैसे दिखायी देता है।

बृहस्पति के वलय

वलय दूरी(000किमी) चौड़ाई(किमी) द्रव्यमान(kg)
हालो Halo 100000 22800 ?
मुख्य Main 122800 6400 1e13
गोसामेर Gossamer 129200 214200 ?

बृहस्पति  के चन्द्रमा

  • बृहस्पति के 63 से ज्यादा चन्द्रमा है जिसमे 4 गैलीलीयन चन्द्रमा है।
  • बृहस्पति की घुर्णन गति उसके 4 गैलीलीयन चन्द्रमा द्वारा कम होते जा रही है।आयो युरोपा और गीनीमेड यह 1:2:4 की कक्षिय अनुपात मे है। कैलीस्टो भी लगभग इसमे है। कुछ लाख वर्ष बाद यह चारो ग्रह 1:2:4:8 के कक्षिय अनुपात मे आ जायेंगे।
  • बृहस्पति के चन्द्रमाओ का नाम जीयस से जुड़े अन्य पात्रो के नाम पर है।
आयो,युरोपा,गीनीमेड और केलीस्टो

आयो,युरोपा,गीनीमेड और केलीस्टो

उपग्रह(चन्द्रमा) दूरी(000किमी) त्रिज्या(किमी) द्रव्यमान(किग्रा) आविष्कारक दिनांक
मेटीस Metis 128 20 9.56e16 सीन्नाट Synnott 1979
आड्रेस्टीआAdrastea 129 10 1.91e16 जेवीट Jewitt 1979
अमाल्थीया Amalthea 181 98 7.17e18 बर्नार्ड Barnard 1892
थेबे Thebe 222 50 7.77e17 सीन्नाट Synnott 1979
आयो Io 422 1815 8.94e22 गैलीलीयो Galileo 1610
युरोपा Europa 671 1569 4.80e22 गैलीलीयो Galileo 1610
गीनीमेड Ganymede 1070 2631 1.48e23 गैलीलीयो Galileo 1610
कैलीस्टो Callisto 1883 2400 1.08e23 गैलीलीयो Galileo 1610
लीडा Leda 11094 8 5.68e15 कोवल Kowal 1974
हीमालीया Himalia 11480 93 9.56e18 पेरीने Perrine 1904
लीस्थीया Lysithea 11720 18 7.77e16 Nicholson 1938
एलारा Elara 11737 38 7.77e17 पेरीने Perrine 1905
एनाके Ananke 21200 15 3.82e16 निकल्शन Nicholson 1951
कार्मे Carme 22600 20 9.56e16 निकल्शन Nicholson 1938
पासीफे Pasiphae 23500 25 1.91e17 मेलोटे Melotte 1908
सीनोपे Sinope 23700 18 7.77e16 निकल्शन Nicholson 1914
जनवरी 21, 2011

युद्ध का देवता : मंगल

मंगल ग्रह

मंगल ग्रह

मंगल ग्रह सूर्य से चौथा और सातवां बड़ा ग्रह  है:

कक्षा :1.52: 227,940,000 किमी ( ए.यू. सूर्य से)
व्यास : 6794 किमी
द्रव्यमान : 6.4219e23 किलो

मंगल ग्रह (यूनानी: Ares ) युद्ध के भगवान है। शायद इस ग्रह को यह नाम अपने लाल रंग की वजह से नाम मिला है।मंगल ग्रह कभी कभी लाल ग्रह के रूप में जाना जाता है. (एक दिलचस्प तथ्य पर ध्यान दें: रोमन देवता मार्स कृषि देवता का देवता था। मार्च का महिना मंगल से जुड़ा है।)

मंगल को प्रागैतिहासिक काल से जाना जाता रहा है। मंगल का निरिक्षण पृथ्वी की अनेको वेधशालाओ से होता रहा है लेकिन बड़ी बड़ी दूरबीन भी मंगल को एक कठीन लक्ष्य मानती है, यह ग्रह बहुत छोटा है। यह ग्रह विज्ञान फतांसी के लेखको का पृथ्वी से बाहर जीवन के लिये चहेता ग्रह है। लेकिन लावेल द्वारा देखी गयी प्रसिद्ध नहरे और मंगल पर जीवन परिकथाओ जैसा कल्पना मे ही रहा है।

मंगल और पृथ्वी (आकार के अनुपात मे)

मंगल और पृथ्वी (आकार के अनुपात मे)

मंगल पर 1965 मे मैरीनर -4 यान भेजा गया था। उसके बाद इस ग्रह पर मार्स 2 जो मंगल पर उतरा भी था,के अलावा बहुत सारे यान भेजे गये है। 1976 मे दो वाइकिंग यान भी मंगल पर उतरे थे। इसके 20 वर्ष पश्चात 4 जुलाई 1997 को मार्श पाथफाईंडर मंगल पर उतरा था। 2004 मे मार्स एक्स्पेडीसन रोवर प्रोजेक्ट के दो वाहन स्प्रिट तथा ओपरच्युनिटी मंगल पर भौगोलिक आंकड़े और तस्वीरे भेजने उतरे थे। 2008 मे फिनिक्स यान मंगल के उत्तरी पठारो मे पानी की खोज के लिये उतरा था। मंगल की कक्षा मे मार्स रीकानैसेन्स ओर्बीटर मार्स ओडीसी तथा मार्स एक्सप्रेस यान है।

मंगल की कक्षा दिर्घवृत्त मे है जिसके कारण इसके तापमान मे सूर्य से दूरस्थ बिन्दू और निकटस्थ बिन्दू के मध्य 30 डिग्री सेल्सीयस का अंतर आता है। इससे मंगल के मौसम पर असर होता है। मंगल पर औसत तापमान 218 डिग्री केल्वीन(-55 डिग्री सेल्सीयस) है। मंगल की सतह का तापमान 133 डिग्री सेल्सीयस से 27 डिग्री सेल्सीयस तक बदलता है।

मंगल पृथ्वी से काफी छोटा है लेकिन मंगल पर उपलब्ध भूमि पृथ्वी पर उपलब्ध भूमी के बराबर है।
थारसीस उभार

थारसीस उभार

मंगल पर भूदृश्य काफी रोचक और विविधताओ से भरा है। कुछ मुख्य है

  1. ओलिंप मोन्स : सौर मंडल में सबसे बड़ा पर्वत है जो 78,000 फीट(24किमी) उंचा है,आधार पर व्यास में 500 किलोमीटर से अधिक है.
  2. थारसीस: 10 किमी उचांई का और 4000 किमी चौड़ा और एक विशाल उभार है।
  3. वैलेस मारीनेरीस घाटी: 4000 किमी लंबाई और 10 किमी गहरी घाटीयो की एक प्रणाली।
  4. हेलास प्लेन्टीया: दक्षिणी गोलार्द्ध मे 2000 किमी व्यास और 6 कीमी गहरा क्रेटर
मंगल की सतह काफी पूरानी है और क्रेटरो से भरी हुयी है, लेकिन वहां पर कुछ नयी घाटीया, पहाड़ीयां और पठार भी है। यह सब जानकारीयां मगंल भेजे गये यानो ने दी है। पृथ्वी की दूरबीने (हब्बल सहित) यह सब देख नही पाते है।

मंगल का दक्षिणी गोलार्ध चन्द्रमा के जैसे क्रेटरो से भरा हुआ उठा हुआ और प्राचीन है। इसके विपरित उत्तरी गोलार्ध नये पठारो बना निचला है। इन दोनो की सीमा पर उंचाई मे एक आकस्मिक उंचाई मे बदलाव दिखायी देता है। इस आकस्मिक उंचाई मे बदलाव के कारण अज्ञात है। मार्श ग्लोबल सर्वेयर यान ने जो ३ आयामी मंगल का नक्शा बनाय है इन सभी रचनाओ को दिखाता है।

मंगल की आंतरिक संरचना के बारे मे सतह के आंकड़ो द्वारा प्राप्त जानकारी के आधार से ही अनुमान लगाया गया है। मंगल के केन्द्र मे 1700 किमी त्रिज्या का केन्द्रक है, उसके चारो पिघली चट्टानो का मैंटल है जो पृथ्वी से मैंटल से ज्यादा घना है, इनके बाहर एक पतला भूपटल है। मार्स ग्लोबल सर्वेयर के आंकड़ो से भूपटल की मोटाई दक्षिण गोलार्ध 80 किमी तथा उत्तर गोलार्ध मे 35किमी है। चट्टानी ग्रहो मे मंगल का कम घनत्व यह दर्शाता है कि इसके केन्द्रक मे सल्फर की मात्रा लोहे की मात्रा से ज्यादा है।
बुध और चन्द्रमा की तरह मंगल मे भी क्रियाशील प्लेट टेक्टानिक्स नही है क्योंकि मंगल मे मोड़दार पर्वत(पृथ्वी पर हिमालय) नही है। प्लेट की गतिविधी ना होने से सतह के निचे के गर्म स्थान अपनी जगह रहते है, तथा कम गुरुत्व के कारण थारी उभार जैसे उभारो तथा ज्वालामुखी की संभावना ज्यादा रहती है। हालिया ज्वालामुखीय गतिविधी के कोई प्रमाण नही मीले है। मार्स ग्लोबल सर्वेयर के अनुमानो से मंगल मे किसी समय टेक्टानिक गतिविधी रही होंगी।
मंगल की सतह (पाथ फाईण्डर द्वारा ली गयी तस्वीर)

मंगल की सतह (पाथ फाईण्डर द्वारा ली गयी तस्वीर)

मंगल की सतह पर क्षरण के साफ प्रमाण मीले है जिसमे बाढ़ द्वारा क्षरण या छोटी नदीयो द्वारा क्षरण का समावेश है। किसी समय मंगल पर कोई द्रव पदार्थ जरूर रहा होगा। द्रव जल की संभावना ज्यादा है लेकिन अन्य संभावना भी है। यानो द्वारा भेजे गये आंकड़े बताते है कि मंगल पर बड़ी झीले या सागर भी रहे होंगे। ये आंकड़े क्षरण की इन नहरो की उम्र 5 अरब वर्ष बताते है। मार्स एक्स्प्रेस द्वारा भेजी गयी एक तस्वीर मे जमा हुआ समुद्र दिखायी देता है हो 50 लाख वर्ष पहले द्रव रहा होगा। वैलेस मारीनेरीस घाटी द्रव के बहने से नही बनी है। यह थारसीस उभार द्वारा भूपटल मे आयी दरारो से बनी है।

इतिहास मे मंगल पृथ्वी जैसा रहा होगा। पृथ्वी पर सारी कार्बन डाय आक्साईड कार्बोनेट चट्टान मे उपयोग मे आ गयी थी, लेकिन मंगल पर प्लेट टेक्टानिक्स नही होने से मंगल पर कार्बन डाय आक्साईड के उपयोग और उत्सर्जन का चक्र पूरा नही हो पाता है। इन कारणो से मंगल पर तापमान बढाने लायक ग्रीन हाउस प्रभाव नही बन पाता है(यह तापमान को 5 डीग्री केल्विन तक ही बढा़ पाता है जो पृथ्वी और शुक्र की तुलना मे काफी कम है)। इस कारण मंगल की सतह पृथ्वी की तुलना मे ठंडी है।

मंगल का वातावरण पतला है। वातावरण मे 95.3% कारबन डाय आक्साईड, 2.7% नायट्रोजन, 1.6% आरगन ,0.15 % आक्सीजन और 0.03% जल बाष्प है। औसत वायुमंडलीय दबाव 7 मीलीबार है, जो पृथ्वी के 1% के बराबर है लेकिन यह गहराईयो मे 9 मीलीबार से ओलम्पस मान्स पर 1 मीलीबार तक रहता है। लेकिन यह वातावरण तेज हवाओ और महिनो तक चलने वाले धूल के अंधड़ पैदा करने मे सक्षम है।

ध्रुवो पर बर्फ की परत

ध्रुवो पर बर्फ की परत

मंगल के ध्रुवो पर बर्फ की परत है। यह बर्फ की परत पानी और कार्बन डाय आक्साईड की बर्फ है। उत्तरी गोलार्ध की गर्मीयो मे कारबन डायाअक्साईड की बर्फ पिघल जाती है और पानी की बर्फ की तह रह जाती है। मार्स एक्सप्रेस ने यह अब दक्षिणी गोलार्ध मे भी देखा है। अन्य स्थानो पर भी पानी की बर्फ के होने की आशा है।

वाइकिंग यानो ने मंगल पर जिवन की तलाश की थी लेकिन वैज्ञानिको का मानना है कि मंगल पर जिवन नही है। भविष्य मे कुछ प्रयोग और किये जायेंगे।

6 अगस्त 1996 को, डेविड मैके एट अल की घोषणा की है कि उल्का ALH84001 में के सूक्ष्मजीव मंगल ग्रह पर जिवन के सबूत हो सकते है।हालांकि अभी भी कुछ विवाद है, वैज्ञानिक समुदाय के बहुमत ने इस निष्कर्ष को स्वीकार नहीं किया। अगर मंगल ग्रह पर जीवन था, वह हम अभी यह नहीं मिला है।

मंगल पर कमजोर चुंबकिय क्षेत्र कुछ हिस्सो मे मौजूद है। यह खोज मार्श ग्लोबल सर्वेयर ने की थी। यह क्षेत्र किसी समय मंगल पर रहे बडे चुंबकिय क्षेत्र के अवशेष है।

मंगल को रात मे नंगी आंखो से देखा जा सकता है।

 

फोबोस और डीमोस

फोबोस और डीमोस

मंगल के उपग्रह

मंगल के 2 छोटे उपग्रह है।

उपग्रह दूरी (000 किमी) द्रव्यमान(किलो) त्रिज्या (किमी) आविष्कारक दिनांक
फोबोस 9 1.08e16 11 हॉल 1877
डेमोस 23 1.80e15 6 हॉल 1877
(मंगल ग्रह के केंद्र से दूरी मापी गयी है।)
दिसम्बर 17, 2010

पृथ्वी

पृथ्वी-अपोलो १७ द्वारा ली गयी तस्वीर

पृथ्वी-अपोलो १७ द्वारा ली गयी तस्वीर

पृथ्वी सूर्य से तीसरा और पांचवां सबसे बड़ा ग्रह है।

कक्षा 1.00: 149,600,000 किमी ( ए.यू. सूर्य से)

व्यास : 12,756.3 मी

द्रव्यमान : 5.972e24 किलो

पृथ्वी ग्रह अकेला ग्रह है जिसका  अंग्रेजी नाम ग्रीक / रोमन पौराणिक कथाओं से नहीं है।

पहले यह सोचा जाता था कि सारा ब्रम्हांड पृथ्वी की परिक्रमा करता है लेकिन कोपर्निकस (सोलहवीं सदी) के बाद यह समझ में आ गया है कि पृथ्वी सिर्फ एक ग्रह है।

ज़ाहिर है कि अंतरिक्ष यान की सहायता के बिना पृथ्वी का अध्ययन किया जा सकता है। फिर भी बीसवीं सदी तक पूरे ग्रह के नक्शे नही थे। अंतरिक्ष से ली गई है ग्रह की तस्वीरें काफी महत्व की हैं और वे असाधारण रूप से सुंदर हैं। अंतरिक्ष उपग्रहमौसम की भविष्यवाणी में एक विशाल मदद कर रहे हैं साथ ही  विशेष रूप से ट्रैकिंग और तूफान की भविष्यवाणी करने में।

पृथ्वी की संरचना

पृथ्वी की संरचना

पृथ्वी कई परतों में विभाजित है जो विशिष्ट रासायनिक और भूकंपी गुण से अलग अलग है  :

(गहराई किमी में है)

  1. 0-40 भूपटल
  2. 4-40 ऊपरी मैंटल
  3. 400-650 संक्रमण क्षेत्र
  4. 650-2700 अंत: मैंटल
  5. 2700-2890 डी परत
  6. 2890-5150बाह्य केन्द्रक
  7. 5150-6378 अंत: केन्द्रक

भूपटल वाली परत की मोटाई समान नही है, यह समुद्रो के तल पर पतली है तथा महाद्बीपो के निचे मोटी है। अंत: केण्द्रक तथा भूपटल ठोस है। बाह्य केन्द्रक तथा मैंटल परते अर्धद्रव है। पृथ्वी के द्रव्यमान का ज्यादातर मैंटल परत में है, बाकी का अधिकांश केन्द्रक में ,  वह हिस्सा जिसमे हम  निवास करते है इसका एक छोटा सा अंश है

  1. वातावरण =  0.0000051
  2. महासागर = 0.0014
  3. भूपटल = 0.026
  4. मैंटल =4.043
  5. बाहरी केन्द्रक = 1.835
  6. भीतरी केन्द्रक = 0.09675

(सभी x10 ^ 24 किलोग्राम मे)

केन्द्रक मुख्यतः लोहे(लोहा/निकेल) का बना है लेकिन हो सकता है कुछ हल्के तत्व भी मौजूद हो। केन्द्रक पर तापमान 7500 डीग्री केल्वीन है। अंतः मैंटल मुख्यतः सीलीकान , मैग्नेशीयम, आक्सीजन से बना है जिसमे कुछ लोहा, कैल्सीयम और अल्म्युनियम भी है। उपरी मैंटल सतह लौह और मैग्नेशीयम के सीलीकेट से बनी है। यह सब हम भूगर्भीय गतिविधियो से जानते है, ज्वालामुखी का लावा निचली परतो के नमूने उपर लाते रहता है। भूपटल सीलीकान डाय आक्साईड के क्रिस्टलो से बनी है।

पृथ्वी की रासायनिक संरचना :

  1. 34.6% आयरन
  2. 29.5% आक्सीजन
  3. 15.2% सिलिकन
  4. 12.7% मैग्नेशियम
  5. 2.4% निकेल
  6. 1.9% सल्फर
  7. 0.05% टाइटेनियम

धरती का घनत्व पूरे सौरमंडल मे सबसे ज्यादा है।

बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल (आकार के अनुपात मे)

बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल (आकार के अनुपात मे)

बाकी चट्टानी ग्रह की संरचना कुछ अंतरो के साथ पृथ्वी के जैसी ही है। चन्द्रमा का केन्द्रक छोटा है, बुध का केन्द्र उसके कुल आकार की तुलना मे विशाल है, मंगल और चंद्रमा का मैंटल कुछ मोटा है, चन्द्रमा और बुध मे रासायनिक रूप से भिन्न भूपटल नही है,सिर्फ पृथ्वी का अंत: और बाह्य मैंटल परत अलग है। ध्यान दे कि ग्रहो(पृथ्वी भी) की आंतरिक संरचना के बारे मे हमारा ज्ञान सैद्धांतिक ही है।

अन्य चट्टानी के विपरित पृथ्वी का भूपटल कुछ ठोस प्लेटो मे विभाजित है जो निचले द्रव मैंटल पर स्वतण्त्र रूप से बहते रहती है। इस गतिविधी को प्लेट टेक्टानिक कहते है।

पृथ्वी की मुख्य प्लेंटे

(वर्तमान में) आठ प्रमुख प्लेट:

  1. उत्तर अमेरिकी प्लेट – उत्तरी अमेरिका, पश्चिमी उत्तर अटलांटिक और ग्रीनलैंड
  2. दक्षिण अमेरिकी प्लेट – दक्षिण अमेरिका और पश्चिमी दक्षिण अटलांटिक
  3. अंटार्कटिक प्लेट – अंटार्कटिका और “दक्षिणी महासागर”
  4. यूरेशियाई प्लेट – पूर्वी उत्तर अटलांटिक, यूरोप और भारत के अलावा एशिया
  5. अफ्रीकी प्लेट – अफ्रीका, पूर्वी दक्षिण अटलांटिक और पश्चिमी हिंद महासागर
  6. भारतीय -आस्ट्रेलियाई प्लेट – भारत, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और हिंद महासागर के अधिकांश
  7. नाज्का प्लेट – पूर्वी प्रशांत महासागर से सटे दक्षिण अमेरिका
  8. प्रशांत प्लेट – प्रशांत महासागर के सबसे अधिक (और कैलिफोर्निया के दक्षिणी तट!)

पृथ्वी का भूपटल काफी नया है। खगोलिय पैमाने पर यह बहुत छोटे अंतराल 500,000,000 वर्ष मे बना है। क्षरण और टेक्टानीक गतिविधी पृथ्वी के भूपटल को नष्ट कर नया करते रहती है, इस तरक ऐतिहासिक भौगोलिक गतिविधियो के प्रमाण (क्रेटर)नष्ट होते रहते है। पृथ्वी के शुरुवाती इतिहास के प्रमाण नष्ट हो चुके है। पृथ्वी की आयु 4.5 अरब वर्ष से लेकर 4.6 अरब वर्ष है लेकिन पृथ्वी की सबसे पूरानी चट्टान 4 अरब वर्ष पूरानी है, 3 अरब वर्ष से पूराने चट्टाने दूर्लभ है। जीवित प्राणियो के जीवाश्म की आयु 3.9अरब वर्ष से कम है। जीवन के प्रारंभ के समय के कोई प्रमाण उपलब्ध नही है।
पृथ्वी की सतह का 70% हिस्सा पानी से ढंका है। पृथ्वी अकेला ग्रह है जिस पर पानी द्रव अवस्था मे सतह पर उपलब्ध है।(टाइटन पर द्रव इथेन या मिथेन हो सकती है, यूरोपा की सतह के नीचे द्रव पानी हो सकता है।) हम जानते है कि जीवन के लिये द्रव जल आवश्यक है। सागरो की गर्मी सोखने की क्षमता पृथ्वी के तापमान को स्थायी रखने मे महत्वपूर्ण है। द्रव जल पृथ्वी सतह के क्षरण और मौसम के लिये महत्वपूर्ण है।(मंगल पर भूतकाल मे शायद ऐसी गतिविधी हुयी हो सकती है।)

पृथ्वी के वातावरण मे 77% नायट्रोजन, 21% आक्सीजन,और कुछ मात्रा मे आर्गन,कार्बन डाय आक्साईड और जल बाष्प है। पृथ्वी पर निर्माण के समय  कार्बन डाय आक्साईड की मात्रा ज्यादा रही होगी जो चटटानो मे कार्बोनेट के रूप मे जम गयी, कुछ मात्रा मे सागर द्वारा अवशोषित कर ली गयी, शेष कुछ मात्रा जिवित प्राणियो द्वारा प्रयोग मे आ गयी होगी। प्लेट टेक्टानिक और जैविक गतिविधी कार्बन डाय आक्साईड का थोड़ी मात्रा का उत्त्सर्जन और अवशोषण करते रहते है। कार्बनडाय आक्साईड पृथ्वी के सतह का तापमान का ग्रीन हाउस प्रभाव द्वारा नियंत्रण करती है। ग्रीन हाउस प्रभाव द्वारा पृथ्वी सतह का तापमान 35 डिग्री सेल्सीयस होता है अन्यथा वह -21 डीग्री सेल्सीयस से 14 डिग्री सेल्सीयस रहता; इसके ना रहने पर समुद्र जम जाते और जिवन असंभव हो जाता। जल बाष्प भी एक आवश्यक ग्रीन हाउस गैस है।

रासायनिक दृष्टी से मुक्त आक्सीजन भी आवश्यक है। सामान्य परिस्थिती मे आक्सीजन विभिन्न तत्वो से क्रिया कर विभिन्न यौगिक बनाती है। पृथ्वी के वातावरण मे आक्सीजन का निर्माण और नियंत्रण विभिन्न जैविक प्रक्रियाओ से होता है। जिवन के बिना मुक्त आक्सीजन संभव नही है।

चन्द्रमा पृथ्वी के घुर्णन को अपने गुरुत्व से हर सदी मे २ मीलीसेकन्ड कम कर देता है। ताजा शोधो के अनुसार 90 करोड़ वर्ष पहले एक वर्ष मे 18 घंटो के 481 दिन होते थे।

पृथ्वी का चुंबकिय क्षेत्र(सौर वायू बायें से दायें बहती है)

पृथ्वी का चुंबकिय क्षेत्र(सौर वायू बायें से दायें बहती है)

पृथ्वी का अपना चुंबकिय क्षेत्र है जो कि बाह्य केन्द्रक के विद्युत प्रवाह से निर्मित  होता है। सौर वायू ,पृथ्वी के चुंबकिय क्षेत्र और उपरी वातावरण मीलकर औरोरा बनाते है। इन सभी कारको मे आयी अनियमितताओ से पृथ्वी के चुंबकिय ध्रुव गतिमान रहते है, कभी कभी विपरित भी हो जाते है।
पृथ्वी का चुंबकिय क्षेत्र और सौर वायू मीलकर वान एण्डरसन विकिरण पट्टा बनाते है, जो की प्लाज्मा से बनी हुयी डोनट आकार के छल्लो की जोड़ी है जो पृथ्वी के चारो की वलयाकार मे है। बाह्य पट्टा 19000 किमी से 41000किमी तक है जबकि अतः पट्टा 13000किमी से 7600 किमी तक है।

पृथ्वी के उपग्रह

पृथ्वी और चन्द्रमा(मंगल से खिंची तस्वीर)

पृथ्वी और चन्द्रमा(मंगल से खिंची तस्वीर)

पृथ्वी की एक ही प्राकृतिक उपग्रह है: चन्द्रमा

इसके अलावा हजारो की संख्या मे क्रत्रिम उपग्रह है।

क्षुद्रग्रह 3753 क्रुथेन और 2002ए ए29 पृथ्वी के साथी है। जो पृथ्वी के साथ सूर्य की परिक्रमा करते है।
दूरी मास त्रिज्या उपग्रह

(000 किमी) (किमी) (किलो)

——– ——— —— ——-

चाँद 1738 7.35e22 384

स्थलाकृतियां
पृथ्वी का तल असमान है। तल का 70.8 फीसदी भाग जल से आच्छादित है, जिसमें अधिकांश महासागरीय नितल समुद्री स्तर के नीचे है। धरातल पर कहीं विशाल पर्वत, कहीं ऊबड़-खाबड़ पठार तो कहीं पर उपजाऊ मैदान पाये जाते हैं। महाद्वीप और महासागरों को प्रथम स्तर की स्थलाकृति माना जाता है जबकि पर्वत, पठार, घाटी निचले स्तरों के अंतर्गत रखे जाते हैं।

पृथ्वी का तल भूवैज्ञानिक समय काल के दौरान प्लेट टेक्टोनिक्स और क्षरण की वजह से लगातार परिवर्तित होता रहता है। प्लेट टेक्टोनिक्स की वजह से तल पर हुए बदलाव पर मौसम, वर्षा, ऊष्मीय चक्र और रासायनिक परिवर्तनों का असर पड़ता है। हिमीकरण, तटीय क्षरण, प्रवाल भित्तियों का निर्माण और बड़े उल्का पिंडों के पृथ्वी पर गिरने जैसे कारकों की वजह से भी पृथ्वी के तल पर परिवर्तन होते हैं।

चट्टान
पृथ्वी की सतह से 16 किमी. की गहराई तक पृथ्वी की भूपर्पटी में पाए जाने वाले 95′ पदार्थ चट्टानों के रूप में पाए जाते हैं। इनकी रचना विभिन्न प्रकार के खनिजों का सम्मिश्रण है। विभिन्न आधारों पर किया चट्टानों का वर्गीकरण इस प्रकार है-
आग्नेय शैल (Igneous Rock) – आग्नेय शैल की रचना धरातल के नीचे स्थित तप्त एवं तरल मैग्मा के शीतलन के परिणामस्वरूप उसके ठोस हो जाने पर होती है। उदाहरण- माइका, ग्रेनाइट आदि।

अवसादी शैल (Sedimentary Rocks) – अपक्षय एवं अपरदान के  विभिन्न  साधनों द्वारा मौलिक चट्टानों के विघटन, वियोजन एवं चट्टान-चूर्ण के परिवहन तथा किसी स्थान पर जमाव के फलस्वरूप उसके अवसादों (debris) से निर्मित शैल को अवसादी शैल कहा जाता है। उदाहरण- कोयला, पीट, बालुका पत्थर आदि।

रूपांतरित शैल (Metamorphic rock)- अवसादी एवं आग्नेय शैलों में ताप एवं दबाव के कारण परिवर्तन या रूपांतरण हो जाने से रूपांतरित शैलों का निर्माण होता है। उदाहरण- संगमरमर, क्वाटर्जाइट आदि।

क्वाटर्ज, फेल्सपार, एम्फीबोल, माइका, पाइरोक्सिन और ऑलिविन जैसे सिलिकेट खनिज पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। पृथ्वी की सबसे बाहरी परत को पीडोस्फीयर कहते हैं। इस परत का निर्माण मृदा से हुआ है और इस स्तर पर लगातार मृदा उत्पादन की प्रक्रिया जारी रहती है। पृथ्वी पर स्थलमंडल का निम्नतम बिंदु मृत सागर है जिसकी गहराई समुद्र स्तर से 418 मी. नीचे है जबकि उच्चतम बिंदु माउंट एवरेस्ट है जिसकी समुद्री स्तर से ऊँचाई 8848 मी. है। स्थलमंडल की औसत ऊँचाई 840 मी. है।

महाद्वीप
पृथ्वी पर 7 महाद्वीप स्थित हैं-
एशिया- क्षेत्रफल – 44,614,000 वर्ग किमी.
एशिया सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह विश्व के कुल स्थल क्षेत्र के 1/3 भाग पर स्थित है।  यहाँ की 3/4 जनसंख्या अपने भरण-पोषण के लिए कृषि पर निर्भर है। एशिया चावल, मक्का, जूट, कपास, सिल्क इत्यादि के उत्पादन के मामले में पहले स्थान पर है।
अफ्रीका – क्षेत्रफल – 30,216,000 वर्ग किमी.
अफ्रीका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है। अफ्रीका का 1/3 हिस्सा मरुस्थल है। यहाँ की मात्र 10′ भूमि ही कृषियोग्य है। हीरे व सोने के उत्पादन में अफ्रीका सबसे ऊपर है।

उत्तर अमेरिका- क्षेत्रफल- 24,230,000 वर्ग किमी. यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह दुनिया के 16′ भाग पर स्थित है। कृषीय संसाधनों की दृष्टिïकोण से यह काफी धनी क्षेत्र है। विश्व के कुल मक्का उत्पादन का आधा उत्पादन यहीं होता है। वन, खनिज व ऊर्जा संसाधनों के दृष्टिïकोण से यह काफी समृद्ध क्षेत्र है।

दक्षिण अमेरिका– क्षेत्रफल- 17,814,000 वर्ग किमी. यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा महाद्वीप है। इस महाद्वीप का 2/3 हिस्सा विषुवत रेखा के दक्षिण में स्थित है। इसके बहुत बड़े हिस्से में वन हैं।

अंटार्कटिका- क्षेत्रफल- 14,245,000 वर्ग किमी. यह विश्व का पाँचवा सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह पूरी तरह दक्षिणी गोलाद्र्ध में स्थित है और दक्षिण ध्रुव इसके मध्य में स्थित है। इस महाद्वीप का 99′ हिस्सा वर्षपर्यन्त बर्फ से ढंका रहता है। यहाँ की भूमि पूरी तरह बंजर है।

यूरोप – क्षेत्रफल-10,505,000 वर्ग किमी. यूरोप एकमात्र ऐसा महाद्वीप है जहाँ जनसंख्या घनत्व अधिक होने के साथ-साथ समृद्धता भी है। यहाँ वन, खनिज, उपजाऊ मिट्टी व जल बहुतायत में है। यूरोप के महत्वपूर्ण खनिज संसाधन कोयला, लौह अयस्क, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस हैं।

ऑस्ट्रेलिया- क्षेत्रफल – 8,503,000 वर्ग किमी. यह एकमात्र देश है जो सम्पूर्ण महाद्वीप पर स्थित है। यह देश पादपों, वन्यजीवों व खनिजों के मामले में समृद्ध है लेकिन जल की यहाँ काफी कमी है।

पृथ्वी का भूगर्भिक इतिहास

वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 4.6 अरब वर्ष है। पृथ्वी के सम्पूर्ण भूगर्भिक इतिहास को निम्नलिखित कल्पों (Eras) में विभाजित किया जा सकता है-

पूर्व कैम्ब्रियन (Pre Cambrian Era) – इसी काल से पृथ्वी की शुरुआत हुई। यह कल्प लगभग 57 करोड़ वर्ष पूर्व समाप्त हुआ। इस कल्प के दौरान भूपर्पटी, महाद्वीपों व महासागरों इत्यादि का निर्माण हुआ और जीवन की उत्पत्ति भी इसी काल के दौरान हुई।

पुराजीवी काल (Palaeozoic Era)- 57 करोड़ वर्ष पूर्व से 22.5 करोड़ वर्ष तक विद्यमान इस कल्प में जीवों एवं वनस्पतियों का विकास तीव्र गति से हुआ। इस कल्प को निम्नलिखित शकों (Periods) में विभाजित किया गया है-

  • कैम्ब्रियन (Cambrian)
  • आर्डोविसियन (Ordovician)
  • सिल्यूरियन (Silurian)
  • डिवोनियन (Divonian)
  • कार्बनीफेरस (Carboniferous)
  • पर्मियन (Permian)

मेसोजोइक कल्प (Mesozoic era)- इस कल्प की अवधि 22.5 करोड़ से 7 करोड़ वर्ष पूर्व तक है। इसमें रेंगने वाले जीव अधिक मात्रा में विद्यमान थे। इसे तीन शकों में विभाजित किया गया है-

  • ट्रियासिक (Triassic)
  • जुरासिक (Jurassic)
  • क्रिटैशियस (cretaceous)

सेनोजोइक कल्प (Cenozoic era)– इस कल्प का आरंभ आज से 7.0 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था। इस कल्प में ही सर्वप्रथम स्तनपायी जीवों का आविर्भाव हुआ। इस युग को पाँच शकों में विभाजित किया गया है-

  • पैलियोसीन (Paleocene)
  • इयोसीन (Eocene)
  • ओलिगोसीन (Oligocene)
  • मायोसीन (Miocene)
  • प्लायोसीन (Pliocene)

इस युग में हिमालय, आल्प्स, रॉकीज, एण्डीज आदि पर्वतमालाओं का विकास हुआ।

नियोजोइक या नूतन कल्प (Neozoic Era) – 10 लाख वर्ष पूर्व से वर्तमान समय तक चलने वाले इस कल्प को पहले चतुर्थक युग (Quaternary Epoch) में रखकर पुन: प्लीस्टोसीन हिमयुग (Pleistocene) तथा वर्तमान काल जिसे होलोसीन (Holocene) कहा जाता है, में वर्गीकृत किया जाता है।

पर्वत
पर्वत धरातल के ऐसे ऊपर उठे भागों के रूप में जाने जाते हैं, जिनका ढाल तीव्र होता है और शिखर भाग संंकुचित क्षेत्र वाला होता है। पर्वतों का निम्नलिखित चार भागों में वर्गीकरण किया जाता है-
मोड़दार पर्वत (Fold Mountains) – पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों द्वारा धरातलीय चट्टानों में मोड़ या वलन पडऩे के परिणामस्वरूप बने हुए पर्वतों को मोड़दार अथवा वलित पर्वत कहते हैं। उदाहरण- यूरोप के आल्प्स, दक्षिण अमेरिका के एण्डीज व भारत की अरावली शृंखला।

अवरोधी पर्वत या ब्लॉक पर्वत (Block Mountains)- इन पर्वतों का निर्माण पृथ्वी की आंतरिक हलचलों के कारण तनाव की शक्तियों से धरातल के किसी भाग में दरार पड़ जाने के परिणामस्वरूप होता है। उदाहरण- यूरोप में ब्लैक फॉरेस्ट तथा वासगेस (फ्रांस) एवं पाकिस्तान में साल्ट रेंज।

ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic) – इन पर्वतों का निर्माण ज्वालामुखी द्वारा फेंके गए पदार्थों से होता है। उदाहरण- हवाई द्वीप का माउंट माउना लोआ व म्यांमार का माउंट पोपा ।

अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains) – इनका निर्माण विभिन्न कारकों द्वारा अपरदन से होता है। उदाहरण- भारत के अरावली, नीलगिरि आदि।

पठार
साधारणतया अपने सीमावर्ती धरातल से पर्याप्त ऊँचे एवं सपाट तथा चौड़े शीर्ष भाग वाले स्थलरूप को ‘पठार’ के नाम से जाना जाता है। इनके निम्नलिखित तीन प्रकार होते हैं-
अन्तरापर्वतीय पठार (Intermountane Plateau) – ऐसे पठार चारों ओर से घिरे रहते हैं। उदाहरण- तिब्बत का पठार, बोलीविया, पेरू इत्यादि के पठार।
पीडमॉण्ट पठार (Piedmont Plateau)- उच्च पर्वतों की तलहटी में स्थित पठारों को ‘पीडमॉण्ट’ पठार कहते हैं। उदाहरण – पीडमॉण्ट (सं. रा. अमेरिका), पेटागोनिया (दक्षिणी अमेरिका) आदि।
महाद्वीपीय पठार (Continental Plateau) – ऐसे पठारों का निर्माण पटल विरूपणी बलों द्वारा धरातल के किसी विस्तृतभू-भाग के ऊपर उठ जाने से होता है। उदाहरण- भारत के कैमूर, राँची तथा कर्नाटक के पठार।

दिसम्बर 17, 2010

सुंदरता और प्यार की देवी : शुक्र

शुक्र ग्रह

शुक्र ग्रह

शुक्र सूर्य से दूसरा ग्रह है और छठंवा सबसे बड़ा ग्रह है। शुक्र की कक्षा लगभग पूर्ण वृत्त है।
कक्षा :0.72 AU या 108,200,000 किमी ( सूर्य से)

व्यास : 12,103.6 किमी

द्रव्यमान : 4.869e24 किग्रा

शुक्र ग्रह सुंदरता और प्यार की देवी के नाम से जाना जाता है। (इसे यूनानी मे Aphrodite तथा बेबीलोन निवासी मे Ishtar कहते थे।) इसे यह नाम इस कारण दिया गया क्योंकि यह सबसे ज्यादा चमकिला ग्रह है।

शुक्र ग्रह को प्रागैतिहासिक काल से जाना जाता। यह सूर्य और चंद्रमा के अलावा आकाश में सबसे चमकदार पिंड है। बुध के जैसे ही इसे भी दो नामो भोर का तारा(यूनानी :Eosphorus ) और शाम का तारा के(यूनानी : Hesperus ) नाम से जाना जाता रहा है। ग्रीक खगोलशास्त्री जानते थे कि यह दोनो एक ही है।

गैलीलीयो ने दिखाया की शुक्र कलाये दिखाता है क्योकि वह सूर्य की परिक्रमा करता है।

गैलीलीयो ने दिखाया की शुक्र कलाये दिखाता है क्योकि वह सूर्य की परिक्रमा करता है।

शुक्र भी एक आंतरिक ग्रह है, यह भी चन्द्रमा की तरह कलाये प्रदर्शित करता है। गैलेलीयो द्वारा शुक्र की कलाओं के निरिक्षण कोपरनिकस के सूर्यकेन्द्री सौरमंडल सिद्धांत के सत्यापन के लिये सबसे मजबूत प्रमाण दिये थे।
1962 मे शुक्र ग्रह की यात्रा करने वाला पहला अंतरिक्ष यान मैरीनर2 था। उसके बाद 20से ज्यादा शुक्र ग्रह की यात्रा पर जा चूके हैं जिसमे पायोनियर विनस और सोवियत यान वेनेरा 7 है जो कि किसी दूसरे ग्रह पर उतरने वाला पहला यान था। वेनेरा 9 शुक्र की सतह की तस्वीरे भेजने वाला पहला यान था। अमरीका के यान मैगेलन ने शुक्र की कक्षा मे परिक्रमा करते हुये उसकी सतह का राडार की सहायता से पहला नक्शा बनाया था। युरोपियन अंतरिक्ष एजेण्सी का विनसएक्सप्रेस यान अभी शुक्र की कक्षा मे है।

शुक्र की एक ही सतह पृथ्वी से दिखायी देती है।

शुक्र की एक ही सतह पृथ्वी से दिखायी देती है।

शुक्र का घुर्णन विचित्र है, यह काफी धीमा है। इसका एक दिन 243 पृथ्वी के दिन के बराबर है जो कि शुक्र के एक वर्ष से कुछ ज्यादा है। शुक्र का घुर्णन और उसकी कक्षा कुछ इस तरह है कि शुक्र की केवल एक ही सतह पृथ्वी से दिखायी देती है।
शुक्र को पृथ्वी का जुंड़वा ग्रह कहा जाता है क्योंकि

  1. शुक्र पृथ्वी से थोड़ा ही छोटा है। यह ग्रह व्यास मे पृथ्वी के व्यास का 95% तथा द्रव्यमान मे पृथ्वी का 80% है।
  2. दोनो की सतह मे क्रेटर कम है और सतह अपेक्षाकृत नयी है।
  3. घनत्व तथा रासायनिक संरचना समान है।

इन समानताओ से यह सोचा जाता था कि बादलो के निचे शुक्र ग्रह पृथ्वी के जैसे होगा और शायद वहां पर जिवन होगा। लेकिन बाद के निरिक्षणो से ज्ञात हुआ कि शुक्र पृथ्वी से काफी अलग है और यहां जिवन की संभावना न्युनतम है।

शुक्र ग्रह पर दबाव पृथ्वी के वायुमंडल दबाव का 90 गुना है जोकि पृथ्वी पर सागरसतह से 1 किमी गहराई के तुल्य है। वातावरण मुख्यतः कार्बन डाय आक्साईड से बना है। यहां सल्फुरिक अम्ल के बादलो कई किलोमीटर मोटी कई परते है। यह बादल शुक्र ग्रह की सतह ढंक लेते है जिससे हम उसे देख नही पाते है। यह बादल ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा करते है जिससे शुक्र का तापमान 740डीग्री केल्वीन तक बड़ा देते है। शुक्र की सतह का तापमान बुध से ज्यादा है जबकि वह सूर्य से दूगनी दूरी पर है। शुक्र पर बादलो मे 350 किमी/घंटा की रफ्तार से हवा चलती है जो सतह पर अपेक्षाकृत धीमी (कुछ किमी /घंटा)है।शुक्र पर कभी पानी रहा होगा जो अब बास्पिकृत हो चूका है। शुक्र अब काफी सूखा ग्रह है। पृथ्वी भी शुक्र के जैसे ही होती यदि वह सूर्य से थोड़ा समीप होती।

मैगलेन द्वारा ली गयी तस्वीर

मैगलेन द्वारा ली गयी तस्वीर

शुक्र की सतह से अधिकांश रोलिंग मैदानों हैं। वहां काफी सारे समुद्र जैसे गहरे क्षेत्र है जैसे अटलांटा, गुयेनेवेरे,लावीनिया। कुछ उंचे पठारी क्षेत्र है जैसे ईश्तर पठार जो उत्तरी गोलार्ध मे है और आस्ट्रेलीया के आकार का है;अफ्रोदीते पठार जो भूमध्यरेखा पर है और दक्षिण अमरीका के आकार का है। इश्तर पठार का क्षेत्र उंचा है , इसमे एक क्षेत्र लक्ष्मी प्लेनम है जो शुक्र के पर्वतो से घीरा है। इनमे से एक महाकाय पर्वत मैक्सवेल मान्टेस है।

मैग्लेन यान से प्राप्त आंकड़े बताते है कि शुक्र की सतह का अधिकतर भाग लावा प्रवाह से ढंका है। उस पर काफी सारे मृत ज्वालामुखी है जैसे सीफ मान्स। हाल ही मे प्राप्त आंकड़े बताते है कि शुक्र अभी भी ज्वालामुखी सक्रिय है लेकिन कुछ ही क्षेत्रो मे; अधिकतर भाग लाखो वर्षो से शांत है।

शुक्र पर छोटे क्रेटर नही है। ऐसा प्रतित होता है कि उल्काये शुक्र के वातावरण मे सतह से टकराने से पहले ही जल जाती है। शुक्र की सतह पर क्रेटर गुच्छो मे है जो यह बताती है कि बड़ी उल्का सतह से टकराने से पहले छोटे टूकड़ो मे बंट जाती है।

शुक्र के प्राचीनतम क्षेत्र 8000लाख वर्ष पूराने है। ज्वालामुखीयो ने शुक्र के पुराने बड़े क्रेटरो को भर दिया है।

शुक्र का अंतरिक भाग पृथ्वी जैसा है, 3000 किमी त्रिज्या की लोहे का केन्द्र ;उसके आसपास पत्थर की परत। ताजा आंकड़ो के अनुसार शुक्र की पपड़ी ज्यादा मोटी और मजबूत है। पृथ्वी के जैसे ही शुक्र पर सतह पर दबाव बनता है और भूकंप आते है।
शुक्र का कोई चुंबकिय क्षेत्र नही है। शुक्र का कोई चन्द्रमा नही है।

आकाश मे शुक्र

आकाश मे शुक्र

शुक्र को नंगी आंखो से देखा जा सकता है। यह आकाश मे सबसे चमकिला पिंड है।

 

शुक्र पर अभियान

जहां औसत तापमान 460 डिग्री सेल्सियस है

हम जब भी अंतरिक्ष में जाने की बात करते हैं, हमारे मन में चंद्रमा पर जाने या फिर मंगल ग्रह पर जाने का ख़्याल सबसे पहले आता है। ये दोनों धरती के सबसे क़रीब जो हैं। मगर, एक और ग्रह जो धरती के क़रीब है वो है शुक्र। वहां जाने की ज़्यादा बात नहीं होती है।

लेकिन अब अमरीका और रूस के अलावा यूरोपीय देशों की स्पेस एजेंसी भी शुक्र ग्रह पर अभियान भेजने की तैयारी कर रही है।

शुक्र ग्रह, हमारे सौर मंडल के सबसे भयानक माहौल वाले ग्रहों में से एक है। ये पूरी तरह से गंधक के एसिड के बादलों से ढका है। यहां औसत तापमान 460 डिग्री सेल्सियस रहता है। यहां कार्बन डाई ऑक्साइड का दबाव धरती से नब्बे गुना ज़्यादा है। सीसा, ज़िंक और टिन जैसी धातुएं भी यहां पिघली हुई पाई जाती हैं। कार्बन डाई-आक्साइड यहां इतनी भारी होती है, जितनी सागर के एक किलोमीटर अंदर होती है। इतने दबाव में पनडुब्बियां भी तबाह हो जाती हैं।
मगर, बरसों बाद एक बार फिर शुक्र ग्रह में मानव की दिलचस्पी पैदा हुई है।

जापान ने अभी हाल ही में अकात्सुकी अभियान भेजा था, जो पिछले साल दिसंबर से शुक्र का चक्कर लगा रहा है। नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी भी 2020 तक शुक्र पर अपना अभियान भेजने की तैयारी कर रही हैं। यहां तक कि रूस भी शुक्र पर स्पेसक्राफ्ट भेजने का इरादा किए हुए है।

रूस ही वो पहला देश था जिसने सत्तर और अस्सी के दशक में शुक्र ग्रह पर वेनेरा और वेगा जैसे बेहद कामयाब अभियान भेजे थे।ये शुक्र का चक्कर लगाने के लिए भेजे गए थे। रूस इस बार भी शुक्र का चक्कर लगाने वाला अंतरिक्ष यान भेजने की तैयारी में है।

लेकिन, सिर्फ़ चक्कर लगाने वाले यान से बात नहीं बनेगी। शुक्र के माहौल को समझने के लिए एक अंतरिक्ष यान वहां उतारना होगा। यही सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि शुक्र ग्रह इतना गर्म है, वहां का माहौल इतना भयानक है कि कोई भी अंतरिक्ष यान उस माहौल में घंटे-दो घंटे भी नहीं टिक पाएगा। वैसे रूस के अभियान वेनेरा डी में एक स्पेसक्राफ्ट शुक्र के धरातल पर उतारने के लिए भी जाएगा। मगर ये वहां बमुश्किल तीन घंटे टिक पाए तो भी बड़ी बात है।
इससे पहले भी सोवियत संघ ने 1982 में वेनेरा 13 लैंडर, शुक्र पर उतारा था। ये कुल 127 मिनट तक बच सका। शुक्र के बेहद गर्म माहौल में ये उसके बाद जलकर राख हो गया।

वहां की भयंकर गर्मी, बेहद ख़तरनाक रसायन वाले वातावरण में किसी यान को दिन भर के लिए बचाए रखना वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। वो इतने वक़्त तक रुकेगा तभी वहां के माहौल का जायज़ा लेकर वहां की रिपोर्ट पृथ्वी पर भेज सकेगा। इसके लिए उसके अंदर के चिप, सर्किट, इलेक्ट्रॉनिक और इलेक्ट्रिक सिस्टम, इतने मज़बूत होने चाहिए कि वो वहां की भयंकर गर्मी में जल न जाएं। इस यान को बिना सूरज की रौशनी के काम करना होगा, क्योंकि शुक्र के आसमान पर हमेशा गंधक के बादलों का साया रहता है।

दिक़्क़त ये है कि अगर कोई बैटरी वाला अंतरिक्ष यान तैयार भी कर लिया जाए, तो वो इतनी देर तक चलेंगी नहीं और उनसे इतनी ऊर्जा भी पैदा नहीं हो सकती, जिससे कोई अंतरिक्ष यान देर तक काम कर सके।शुक्र पर भेजे जाने वाले अंतरिक्ष यान के लिए नासा एक अलग तरह की चीज़ से बनी कंप्यूटर चिप तैयार करने में जुटा है। ये ऐसा तत्व होना चाहिए जो 500 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी बचा रहे।

नासा के वैज्ञानिक गैरी हंटर कहते हैं कि कंप्यूटर का पूरा नया सिस्टम की गढ़ना होगा, जिसमें नए इंसुलेटर हों, नई वायरिंग, नई चिप। सब कुछ नया चाहिए। मगर हंटर के मुताबिक़, दिक़्क़त ये है कि तमाम तत्व, बेहद गर्म माहौल में अलग ही तरह का बर्ताव करते हैं। वो सिलिकॉन की मिसाल देते हैं, जो सेमीकंडक्टर है। मगर तापमान 300 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा होने पर, इसका बर्ताव अलग ही हो जाता है। फिर इसके ऊपर के तापमान में ये बचा भी रहेगा कि नहीं, कहना मुश्किल है।

गैरी हंटर बताते हैं कि नासा, सिलीकॉन और कार्बाइड से मिलकर बनने वाले एक पदार्थ से इलेक्ट्रॉनिक चीज़ें तैयार करने की सोच रहे हैं।उन्हें उम्मीद है कि ये तत्व, शुक्र ग्रह की भीषण गर्मी झेल जाएगा।
मगर दिक़्क़त ये है कि इस पदार्थ से डेटा गुज़ारने की रफ़्तार ठीक वैसी होगी जैसी साठ के दशक के कंप्यूटर्स की हुआ करती थी। शुक्र ग्रह पर जाने लायक अंतरिक्ष यान बनाने के लिए नए इंजन की भी ज़रूरत होगी।
इसके लिए 1816 में खोजी गई स्टर्लिंग तकनीक के प्रयोग की कोशिश की जा रही है। इंजन होगा तो इसके लिए ईंधन की भी ज़रूरत होगी। इंजन के विकास पर काम कर रहे वैज्ञानिक इसके लिए लीथियम को सही ईंधन मानते हैं। ये कार्बन डाई-ऑक्साइड और नाइट्रोजन के माहौल में भी जल सकता है। ये 180 डिग्री सेल्सियस पर पिघलता है। जो शुक्र ग्रह के माहौल के लिहाज़ से एकदम सटीक है। इसका वज़न भी कम होता है, जिससे शुक्र ग्रह पर भेजे जाने वाले यान का वज़न भी कम रहेगा।

फिलहाल इस दिशा में कई प्रयोग चल रहे हैं। नई चीज़ें विकसित करने की कोशिश हो रही है।लेकिन अभी कामयाबी हासिल करने के लिए बहुत काम किया जाना बाक़ी है।

शुक्र और हमारी पृथ्वी में कई समानताएं हैं। इनका आकार कमोबेश एक जैसा है। ये सूरज के एक ही हिस्से से अलग होकर ग्रह बने हैं। शुक्र ग्रह, धरती का 81 प्रतिशत माना जाता है। अब अगर मानव शुक्र के बारे में और जानकारी जुटा पाया तो, हम एक पहेली और हल कर सकेंगे कि आख़िर कैसे सूरज से एक साथ अलग होकर ग्रह बने धरती और शुक्र में इतना फ़र्क़ है। जहां धरती पर ज़िंदगी लहलहा रही है, वहीं, शुक्र का माहौल नर्क़ जैसा क्यों है?

दिसम्बर 17, 2010

देवताओ का संदेशवाहक : बुध

बुध ग्रह

बुध ग्रह

बुध सूर्य के सबसे पास का ग्रह है और द्रव्यमान से आंठवे क्रमांक पर है। बुध व्यास से गीनीमेड और टाईटन चण्द्रमाओ से छोटा है लेकिन द्रव्यमान मे दूगना है।
कक्षा : 57,910,000 किमी (0.38 AU) सूर्य से

व्यास : 4880किमी

द्रव्यमान :3.30e23 किग्रा
रोमन मिथको के अनुसार बुध व्यापार, यात्रा और चोर्यकर्म का देवता , युनानी देवता हर्मीश का रोमन रूप , देवताओ का संदेशवाहक देवता है। इसे संदेशवाहक देवता का नाम इस कारण मिला क्योंकि यह ग्रह आकाश मे काफी तेजी से गमन करता है।
बुध को ईसा से 3 सहस्त्राब्दि पहले सूमेरीयन काल से जाना जाता रहा है। इसे कभी सूर्योदय का तारा , कभी सूर्यास्त का तारा कहा जाता रहा है। ग्रीक खगोल विज्ञानियो को ज्ञात था कि यह दो नाम एक ही ग्रह के हैं। हेराक्लीटस यहां तक मानता था कि बुध और शुक्र पृथ्वी की नही, सूर्य की परिक्रमा करते है।
बुध पृथ्वी की तुलना मे सूर्य के समीप है इसलिये पृथ्वी से उसकी चन्द्रमा की तरह कलाये दिखायी देती है। गैलीलीयो की दूरबीन छोटी थी जिससे वे बुध की कलाये देख नही पाये लेकिन उन्होने शुक्र की कलायें देखी थी।

बुध ग्रह की मैसेन्जर यान द्वारा ली गयी तस्वीर

बुध ग्रह की मैसेन्जर यान द्वारा ली गयी तस्वीर

अभी तक दो अंतरिक्ष यान मैरीनर 10 तथा मैसेन्जर बुध ग्रह जा चूके है। मैरीनर- 10 सन 1974 तथा 1975 के मध्य तीन बार इस ग्रह की यात्रा कर चूका है। बुध ग्रह की सतह के 45% का नक्शा बनाया जा चुका है। (सूर्य के काफी समीप होने से हब्ब्ल दूरबीन उसके बाकी क्षेत्र का नक्शा नही बना सकती है।) मैसेन्जर यान 2004 मे नासा द्वारा प्रक्षेपित किया गया था। यह यान भविष्य मे 2011 मे बुध की परिक्रमा करेगा। इसके पहले जनवरी 2008 मे इस यान ने मैरीनर-10द्वारा न देखे गये क्षेत्र की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरे भेंजी थी।

बुध की कक्षा काफी ज्यादा विकेन्द्रीत(eccentric) है, इसकी सूर्य से दूरी 46,000,000 किमी(perihelion ) से 70,000,000 किमी(aphelion) तक रहती है। जब बुध सूर्य के नजदिक होता है तब उसकी गति काफी धिमी होती है। 19वी शताब्दि मे खगोलशास्त्रीयो ने बुध की कक्षा का सावधानी से निरीक्षण किया था लेकिन न्युटन के नियमो के आधार पर वे बुध की कक्षा को समझ नही पा रहे थे। बुध की कक्षा न्युटन के नियमो का पालन नही करती है। निरीक्षित कक्षा और गणना की गयी कक्षा मे अंतर छोटा था लेकिन दशको तक परेशान करनेवाला था। पहले यह सोचा गया कि बुध की कक्षा के अंदर एक और ग्रह (वल्कन) हो सकता है जो बुध की कक्षा को प्रभवित कर रहा है। काफी निरिक्षण के बाद भी ऐसा कोई ग्रह नही पाया गया। इस रहस्य का हल काफी समय बाद आईन्स्टाईन के साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत(General Theory of Relativity) ने दिया। बुध की कक्षा की सही गणना इस सिद्धांत के स्वीकरण की ओर पहला कदम था।

एक परिक्रमा के बाद बुध 1.5 गुना घुम चूका है, २ परिक्रमा के बाद वही गोलार्ध प्रकाशित होगा।

एक परिक्रमा के बाद बुध 1.5 गुना घुम चूका है, २ परिक्रमा के बाद वही गोलार्ध प्रकाशित होगा।

1962 तक यही सोचा जाता था कि बुध का एक दिन और वर्ष एक बराबर होते है जिससे वह अपना एक ही पक्ष सूर्य की ओर रखता है। यह उसी तरह था जिस तरह चन्द्रमा का एक ही पक्ष पृथ्वी की ओर रहता है। लेकिन डाप्लर सिद्धाण्त ने इसे गलत साबीत कर दिया। अब यह माना जाता है कि बुध के दो वर्ष मे तीन दिन होते है। अर्थात बुध सूर्य की दो परिक्रमा मे अपनी स्व्यं की तीन परिक्रमा करता है। बुध और मंडल मे अकेला पिंड है जिसका कक्षा/घुर्णन का अनुपात 1:1 नही है।(वैसे बहुत सारे पिंडो मे ऐसा कोई अनुपात ही नही है।)
बुध की कक्षा मे सूर्य से दूरी मे परिवर्तन के तथा उसके कक्षा/घुर्णन के अनुपात का बुध की सतह पर कोई निरिक्षक विचित्र प्रभाव देखेगा। कुछ अक्षांशो पर निरीक्षक सूर्य को उदित होते हुये देखेगा और जैसे जैसे सूर्य क्षितिज से उपर शीर्षबिंदू तक आयेगा उसका आकार बढता जायेगा। इस शीर्षबिंदू पर आकर सूर्य रूक जायेगा और कुछ देर विपरित दिशा मे जायेगा और उसके बाद फिर रुकेगा और दिशा बदल कर आकार मे घटते हुये क्षितिज मे जाकर सूर्यास्त हो जायेगा। इस सारे समय मे तारे आकाश मे सूर्य से तिन गुना तेजी से जाते दिखायी देंगे। निरीक्षक बुध की सतह पर विभिन्न स्थानो अलग अलग लेकिन विचित्र सूर्य की गति को देखेगा।

बुध की आंतरिक संरचना

बुध की आंतरिक संरचना

बुध की सतह पर तापमान 90 डीग्री केल्वीन से 700डीग्री केल्वीन तक जाता है। शुक्र पर तापमान इससे गर्म है लेकिन स्थायी है।
बुध की सतह पर चन्द्रमा के जैसे क्रेटर (गडढे) है। बुध की सतह स्थायी है, उस पर परतो मे कोई गतिविधी नही है। बुध का घनत्व 5.43 ग्राम/सेमी है और यह पृथ्वी के बाद सबसे ज्यादा घनत्व वाला पिंड है। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण ज्यादा है जो घनत्व को बड़ा देता है अन्यथा बुध का घनत्व सबसे ज्यादा होता। इससे ऐसा प्रतित होता है कि बुध का लौह केन्द्र पृथ्वी के लौह केन्द्र से बड़ा है, शायद बाकि सभी ग्रहो के के केन्द्र से भी ज्यादा। बुध की सतह पर सीलीकेट की एक बारीक पपड़ी है।बुध के केन्द्र मे 1800 किमी से 1900 कीमी त्रीज्या की एक लोहे की गुठली है। सीलीकेट की परत (पृथ्वी जैसे ही) 500 किमी से 600 किमी मोटी है। सतह की पपड़ी 100 से 300 किमी की है। शायद लोहे का केन्द्र का कुछ भाग पिघला हुआ है।

कैलोरीस बेसीन

कैलोरीस बेसीन

बुध पर एक हल्का वातावरण है जो मुख्यतः सौर वायु से आये परमाणुओ से बना है। बुध बहुत गर्म है जिससे ये परमाणु उड़कर अंतरिक्ष मे चले जाते है। ये पृथ्वी और शुक्र के विपरीत है जिसका वातावरण स्थायी है, बुध का वातावरण नविन होते रहता है।
बुध की सतह पर गढ्ढे काफी गहरे है, कुछ सैकड़ो किमी लम्बे और तीन किमी तक गहरे है। ऐसा प्रतित होता है कि बुध की सतह लगभग 0.1 % संकुचित हुयी है।बुध की सतह पर कैलोरीस घाटी है जो लगभग 1300किमी व्यास की है। यह चन्द्रमा के मारीया घाटी के जैसी है। शायद यह भी किसी धूमकेतु या क्षुद्रग्रह के टकराने से बनी है। इन गड्डो के अलाबा बुध ग्रह मे कुछ सपाट पठार भी है जो शायद भूतकाल के ज्वालामुखिय गतिविधीयो से बने है।

मैरीनर से प्राप्त आंकड़े बताते है कि बुध पर कुछ ज्वालामुखिय गतिविधीयां है लेकिन इसे प्रमाणित करने कुछ और आंकड़े चाहिये। आश्चर्यजनक रूप से बुध के उत्तरी ध्रुवो के गड्डो मे पानी की बर्फ के प्रमाण मीले है।

बुध पर हल्का सा चुंबकिय क्षेत्र है जो पृथ्वी के चुंबकिय क्षेत्र की क्षमता का 1% है। बुध का कोई भी ज्ञात चन्द्रमा नही है।

बुध सामान्यतः नंगी आंखो से सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से ठीक पहले देखा जा सकता है। बुध सूर्य के काफी समीप होने से इसे देखना मुश्किल होता है।
कुछ अनसुलझे प्रश्न

  1. बुध का घनत्व पृथ्वी के घनत्व के जैसा 5.43 ग्राम/सेमी ज्यादा है। लेकिन यह हमारे चंद्रमा से ज्यादा मिलता जूलता है। क्या किसी टक्कर से इसकी चट्टानें नष्ट हो गयी थी ?
  2. बुध की सतह पर लोहे की उपस्थिति नही है लेकिन इसकी कोर लोहे की बनी है। यह विचित्र है। क्या बुध अन्य चट्टानी ग्रहो से अलग है ?
  3. बुध के समतल पठार कैसे बने ?
  4. क्या बुध के उस हिस्से मे कुछ आश्चर्य छीपा है जिसे हम देख नही पाये है? कम गुणवत्ता की तस्वीरो मे ऐसा कुछ नही पाया है लेकिन ?
दिसम्बर 16, 2010

सौर मंडल का एक अवलोकन

सौर मंडल मे सूर्य, आठ मुख्य ग्रहों, कम से कम तीन ‘बौने ग्रह‘ , ग्रहों के 130 से अधिक उपग्रहों, बड़ी संख्या में छोटे पिंड(धूमकेतु और क्षुद्रग्रह), और ग्रहों के बीच के माध्यम  का समावेश है। (ध्यान रहे अभी  कई और उपग्रह ऐसे है जिन्हे  अभी तक खोजा नहीं गया है।)

आंतरिक सौर मंडल मे सूर्य , बुध , शुक्र , पृथ्वी और मंगल ग्रह शामिल हैं  :

आंतरिक ग्रह

आंतरिक ग्रह

मुख्य क्षुद्रग्रह पट्टी  बृहस्पति और मंगल ग्रह की कक्षाओं के बीच स्थित हैं(चित्र मे नही दिखाया गयी है)।  बाह्य सौर ग्रहों मे बृहस्पति , शनि , यूरेनस और नेप्च्यून का समावेश है। (ध्यान दे :  प्लूटो  अब एक बौना  ग्रह (Dwarf Planet)के रूप में वर्गीकृत है।)

बाह्य ग्रह

बाह्य ग्रह

सौर मंडल मे अंतरिक्ष ज्यादातर रिक्त(void) है। ग्रहों  के बीच की रिक्त जगह की तुलना करने के लिए ग्रह  बहुत छोटे हैं। यहां तक कि चित्र पर बिन्दू भी ग्रहों के सही आकारों की तुलना मे काफी बड़े है।

कक्षायें

ग्रहों की कक्षायें दिर्घवृत्त(Ellipse) के आकार की है जिसके एक केन्द्र(Focus) मे रवि है, हालांकि बुध की कक्षा लगभग वृताकार है।  सभी ग्रहो की कक्षाये लगभग एक ही प्रतल मे है , जिसे क्रांतिवृत्त कहते है। यह क्रांतिवृत्त पृथ्वी  की कक्षा के प्रतल के द्वारा परिभाषित है (दूसरे शब्दों में क्रांतिवृत्त का प्रतल और पृथ्वी की परिक्रमा का प्रतल एक ही है)। यह क्रांतिवृत्त रवि की भूमध्य रेखा के प्रतल से ७ डिग्री उपर है। चित्र सभी आठ ग्रहों  की कक्षा सापेक्ष आकार मे दर्शाता  है। सभी ग्रह एक ही दिशा (वामावर्त) मे रवि की परिक्रमा करते है। शुक्र, यूरेनस और प्लूटो को छोड़कर सभी ग्रह इसी दिशा मे घूर्णन करते है लेकिन शुक्र, यूरेनस और प्लूटो विपरीत दिशा मे घूर्णन करते है।

ऊपर वाला चित्र अक्टूबर 1996 को सभी ग्रहो की सही स्थिति दर्शाता है।

आकार

तुलनात्मक आकार मे सभी ग्रह (प्लूटो सहित)

तुलनात्मक आकार मे सभी ग्रह (प्लूटो सहित)

ऊपर दिया चित्र  सभी आठ ग्रहों और प्लूटो के तुलनात्मक आकार को दर्शाता है।

सौर मंडल के पिण्डो के तुलनात्मक आकार की कल्पना करने के लिये हमे उन्हे १ अरब गुना छोटा कर देखना होगा।   इस माडल के अनुसार :

  • पृथ्वी का आकार 1.3 सेमी व्यास (अंगूर के दाने के बराबर) का होगा ;
  • चंद्रमा पृथ्वी से 30सेमी दूर होगा;
  • सूर्य 1.5 मीटर व्यास का(मानव की उंचाई के बराबर) और पृथ्वी से 150 मीटर दूरी पर होगा;
  • बृहस्पति 15 सेमी व्यास का(एक बड़े संतरे के आकार का) तथा सूर्य से 750 मीटर दूरी पर होगा;
  • शनि एक संतरे के आकार मे सूर्य से 1500 मीटर दूर तथा
  • यूरेनस और नेपच्यून   नींबु के आकार मे क्रमशः 3 किमी , 4 किमी दूरी पर होंगे।
  • मानव एक परमाणु के बराबर होगा।
  • निकटतम तारा  प्राक्सीमा 4000 किमी पर होगा।

ऊपर के  चित्र मे सौर मण्डल के कई पिण्ड नही दिखाए गये है। इनमे शामिल है,

  • ग्रहो के उपग्रह;
  • क्षुद्रग्रह जो रवि की परिक्रमा कर रहे है (अधिकतर बृहस्पति और मंगल ग्रह की कक्षा के मध्य है);
  • धूमकेतु (छोटे बर्फीले पिंड जो  सौर मंडल मे आते जाते रहते है और उनकी कक्षा  क्रांतिवृत्त से झुकी हुयी होती है) और
  • छोटे क्विपर बेल्ट के बर्फिले पिंड जो नेप्च्यून  से परे है  । कुछ अपवादों को छोड़्कर ग्रहों के उपग्रहों की कक्षा कांतिवृत्त के प्रतल मे ही परिक्रमा करते है लेकिन यह क्षुद्रग्रहों  और धूमकेतु के लिए सच  नहीं है।

ग्रहो के वर्गीकरण मे कई विवाद है। परंपरागत रूप से, सौर प्रणाली को  निम्न वर्गो में विभाजित किया गया है।

  1. ग्रह( सूर्य की परिक्रमा करने वाले बड़े पिंड),
  2. उनके उपग्रह (चन्द्र, विभिन्न आकार के ग्रहों की परिक्रमा करते पिंड),)
  3. क्षुद्रग्रह (छोटे सूर्य की परिक्रमा करते पिंड )और
  4. धूमकेतु (छोटे बर्फीले पिंड जो अत्यधिक अनिश्चित की कक्षाओं मे सूर्य की परिक्रमा करते है)

सौर मंडल काफी जटिल है:

  • यहाँ बुध से बड़े दो चंद्रमा और प्लूटो बड़े कई चन्द्रमा है;
  • यहाँ कई छोटे चन्द्रमा ऐसे है जो  शायद कभी क्षुद्रग्रहों थे और बाद में ग्रहो ने उन्हे अपने गुरुत्वाकषण से बांध लिया;
  • धूमकेतु कभी कभी छोटे हो जाते है और क्षुद्रग्रह जैसे लगते है;
  • क्विपर बेल्ट के पिंडो की तरह  (प्लूटो  और शेरान सहित) इस प्रणाली मे मे अपवाद के जैसे है।
  • पृथ्वी / चंद्रमा युग्म और प्लूटो / शेरान युग्म  को कुछ वैज्ञानिक युग्म ग्रह मानते है।

ग्रहो का वर्गीकरण  रासायनिक संरचना या उत्तपत्ती के स्थान के आधार पर भी किया जा सकता है लेकिन इससे बहुत सारे वर्ग और अपवाद बन जाते है। लब्बोलुआब यह है कि कुछ पिंड अपने आप मे विशेष है और किसी वर्ग मे नही आते है।

आठ मान्य ग्रहों कई तरह से वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • रचना द्वारा:
    • स्थलीय या चट्टानी ग्रह : बुध, शुक्र, पृथ्वी, और मंगल:
      • स्थलीय ग्रहों धातु और चट्टानो से बने है।  इनका अपेक्षाकृत उच्च घनत्व है, धीमी गति से घूर्णन करते है,  इनकी ठोस सतह है, कोई वलय नही है और कम संख्या मे चन्द्रमा है।
    • गैस ग्रह: बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून:
      • आम तौर पर गैस ग्रह मुख्य रूप से हीलियम और हाइड्रोजन के बने हैं और इनका  घनत्व कम है, कई उपग्रह है, तेजी से घूर्णन करते है , गहरा वातावरण है, बहुत सारे वलय है।
  • आकार से:
    • छोटे ग्रह: बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल ग्रह।
      • छोटे ग्रहों जिनका कम से कम व्यास 13000 किमी है ।
    • विशाल ग्रह: बृहस्पति, शनि यूरेनस और नेपच्यून।
      • विशाल ग्रहों  व्यास 48000 किमी  से अधिक है।
    • विशाल ग्रहों  को कभी कभी गैस महादानव भी कहते है।
  • सूर्य के सापेक्ष द्वारा स्थिति:
    • आंतरिक ग्रहों: बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल ग्रह.
    • बाहरी ग्रह: बृहस्पति, शनि, यूरेनस, नेपच्यून.
    • मंगल और बृहस्पति के बीच छोटा क्षुद्रग्रह की पट्टी बाह्य ग्रहो और आंतरिक ग्रहो को अलग करती है।
  • पृथ्वी के सापेक्ष स्थिति के द्वारा :
    • अंदरूनी ग्रह: बुध और शुक्र.
      • पृथ्वी से सूर्य के करीब.
      • अंदरूनी ग्रह की पृथ्वी से चंद्रमा की तरह कला दिखती है।
    • पृथ्वी.
    • बाह्य ग्रह:   मंगल ग्रह से नेपच्यून ग्रह तक .
      • सूर्य से पृथ्वी के आगे.
      • बाह्य ग्रहों हमेशा पूरे दिखाई या लगभग पूरे दिखायी देते है।
  • इतिहास द्वारा :
    • शास्त्रीय ग्रह: बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि
      • ऐतिहासीक काल से ज्ञात ग्रह।
      • नंगी आँख से दिखायी देते है।
      • प्राचीन समय में इसमे सूर्य और चण्द्रमा भी शामिल थे।
    • आधुनिक ग्रह: यूरेनस, नेपच्यून.
      • आधुनिक काल मे खोज।
      • दूरबीन से ही दिखायी देते है।
    • पृथ्वी.
    • IAU के निर्णय के अनुसार शास्त्रीय ग्रहो मे प्लूटो को छोड़ दिया गया है। इस श्रेणी मे अब बुध से लेकर नेप्च्युन तक आठ ही ग्रह है।