Archive for ‘तारा’

जनवरी 25, 2012

सौर मंडल की सीमाये

सौरमंडल सूर्य और उसकी परिक्रमा करते ग्रह, क्षुद्रग्रह और धूमकेतुओ से बना है। इसके केन्द्र मे सूर्य है और सबसे बाहरी सीमा पर नेप्च्युन ग्रह है। नेपच्युन के परे प्लुटो जैसे बौने ग्रहो के अलावा धूमकेतु भी आते है।
हीलीयोस्फियर (heliosphere)
हमारा सौरमंडल एक बहुत बड़े बुलबुले से घीरा हुआ है जिसे हीलीयोस्फियर कहते है। हीलीयोस्फीयर यह सौर वायु द्वारा बनाया गया एक बुलबुला है, इस बुलबुले के अंदर सभी पदार्थ सूर्य द्वारा उत्सर्जित हैं। वैसे इस बुलबुले के अंदर हीलीयोस्फीयर के बाहर से अत्यंत ज्यादा उर्जा वाले कण प्रवेश कर सकते है!

सौरवायु यह किसी तारे के बाहरी वातावरण द्वारा उत्सर्जीत आवेशीत कणो की एक धारा होती है। सौर वायु मुख्यतः अत्याधिक उर्जा वाले इलेक्ट्रान और प्रोटान से बनी होती है, इनकी उर्जा किसी तारे के गुरुत्व प्रभाव से बाहर जाने के लिये पर्याप्त होती है। सौर वायु सूर्य से हर दिशा मे प्रवाहित होती है जिसकी गति कुछ सौ किलोमीटर प्रति सेकंड होती है। सूर्य के संदर्भ मे इसे सौर वायु कहते है, अन्य तारो के संदर्भ मे इसे ब्रम्हांड वायु कहते है।

सूर्य से कुछ दूरी पर प्लुटो से काफी बाहर सौर वायु खगोलिय माध्यम के प्रभाव से धीमी हो जाती है। यह प्रक्रिया कुछ चरणो मे होती है। खगोलिय माध्यम यह हायड्रोजन और हिलीयम से बना हुआ है और सारे ब्रम्हांड मे फैला हुआ है। यह एक अत्याधिक कम घनत्व वाला माध्यम है।

  1. सौर वायु सुपर सोनिक गति से धीमी होकर सबसोनिक गति मे आ जाती है, इस चरण को टर्मीनेशन शाक(Termination Shock) या समापन सदमा कहते है।
  2. सबसोनिक गति पर सौर वायु खगोलिय माध्यम के प्रवाह के प्रभाव मे आ जाती है। इस दबाव से सौर वायु धूमकेतु की पुंछ जैसी आकृती बनाती है जिसे हीलीयोशेथ(Helioseath) कहते है।
  3. हीलीयोशेथ की बाहरी सतह जहां हीलीयोस्फियर खगोलीय माध्यम से मिलता है हीलीयोपाज(Heliopause) कहलाती है।
  4. हीलीयोपाज क्षेत्र सूर्य के आकाशगंगा के केन्द्र की परिक्रमा के दौरान खगोलीय माध्यम मे एक हलचल उतपन्न करता है। यह खलबली वाला क्षेत्र जो हीलीयोपाज के बाहर है बौ शाक (Bow Shock) या धनुष सदमा कहलाता है।

सौर मण्डल और उसकी सीमाये(पूर्णाकार के लिये चित्र पर क्लीक करें)

सौर मंडल की सीमाओ मे सबसे अंदरूनी सीमा है ‘टर्मीनेशन शाक(Termination shock)’  या समापन सदमा, इसके बाद आती है हीलीयोपाज(Heliopause) और अंत मे ‘बौ शाक(bow shock)’ या धनुष सदमा।

टर्मीनेशन शाक
खगोल विज्ञान मे टर्मीनेशन शाक यह सूर्य के प्रभाव को सीमीत करने वाली बाहरी सीमा है। यह वह सीमा है जहां सौर वायु के बुलबुलो की स्थानिय खगोलिय माध्यम के प्रभाव से कम होकर सबसोनिक(Subsonic) गति तक सीमीत हो जाती है। इससे संकुचन , गर्म होना और चुंबकिय क्षेत्र मे बदलाव जैसे प्रभाव उत्पन्न होते है। यह टर्मीनेशन शाक क्षेत्र सूर्य से 75-90 खगोलीय इकाई की दूरी पर है।(1 खगोलिय इकाई= पृथ्वी से सूर्य की दूरी)। टर्मीनेशन शाक सीमा सौर ज्वाला के विचलन के अनुपात मे कम ज्यादा होते रहती है।

समापन सदमा या टर्मीनेशन शाक की उतपत्ती का कारण तारो ने निकलते वाली सौर वायु के कणो की गति (400किमी /सेकंड) से ध्वनी की गति (0.33किमी/सेकंड) मे परिवर्तन है। खगोलिय माध्यम जिसका घनत्व अत्यंत कम होता है और उसपर कोई विशेष दबाव नही होता है ;वही सौर वायू का दबाव उसे उतपन्न करने वाले तारे की दूरी के वर्गमूल के अनुपात मे कम होती है। जैसे सौर वायु तारे से दूर जाती है एक विशेष दूरी पर खगोलिय माध्यम का दबाव सौर वायु के दबाव से ज्यादा हो जाता है और सौर वायु के कणो की गति को कम कर देता है जिससे एक सदमा तरंग(Shock Wave) उत्पन्न होती है।

सूर्य से बाहर जाने पर टर्मीनेशन शाक के बाद एक और सीमा आती है जिसे हीलीयोपाज कहते है। इस सीमा पर सौर वायु के कण खगोलीय माध्यम के प्रभाव मे पूरी तरह से रूक जाते है। इसके बाद की सीमा धनुष सदमा (बौ शाक-bow shock) है जहां सौरवायु का आस्तित्व नही होता है।

वैज्ञानिको का मानना है कि शोध यान वायेजर 1 दिसंबर 2004  मे टर्मीनेशन शाक सीमा पार कर चूका है, इस समय वह सूर्य से 94 खगोलीय इकाई की दूरी पर था। जबकि इसके विपरीत वायेजर 2 ने मई 2006 मे 76 खगोलिय इकाई की दूरी पर ही टर्मीनेशन शाक सीमा पार करने के संकेत देने शूरू कर दिये है। इससे यह प्रतित होता है कि टर्मीनेशन शाक सीमा एक गोलाकार आकार मे न होकर एक अजीब से आकार मे है।

हीलीयोशेथ
हीलीयोशेथ यह टर्मीनेशन शाक और हीलीयोपाक के बीच का क्षेत्र है। वायेजर 1 और वायेजर-2 अभी इसी क्षेत्र मे है और इसका अध्ययन कर रहे हैं। यह क्षेत्र सूर्य से 80 से 100 खगोलीय दूरी पर है।

हीलीयोपाज
यह सौर मंडल की वह सीमा है जहां सौरवायु खगोलीय माध्यम के कणो के बाहर धकेल पाने मे असफल रहती है। इसे सौरमंडल की सबसे बाहरी सीमा माना जाता है।

बौ शाक
हीलीयोपाज क्षेत्र सूर्य के आकाशगंगा के केन्द्र की परिक्रमा के दौरान खगोलीय माध्यम मे एक हलचल उत्पन्न करता है। यह हलचल वाला क्षेत्र जो हीलीयोपाज के बाहर है ,बौ-शाक या धनुष-सदमा कहलाता है।

दिसम्बर 1, 2011

विशालकाय, चमकिला

सबसे विशालकाय

सौर मंडल मे 17 पिंडो की त्रिज्या 1000 किमी से ज्यादा है।

नाम मातृ तारा/ग्रह दूरी (000किमी) व्यास किमी द्रव्यमान किग्रा
सूर्य 697000 1.99e30
बृहस्पति सूर्य 778000 71492 1.90e27
शनि सूर्य 1429000 60268 5.69e26
युरेनस सूर्य 2870990 25559 8.69e25*
नेपच्युन सूर्य 4504300 24764 1.02e26*
पृथ्वी सूर्य 149600 6378 5.98e24
शुक्र सूर्य 108200 6052 4.87e24
मंगल सूर्य 227940 3398 6.42e23
गनीमीड बृहस्पति 1070 2631 1.48e23+
टाईटन शनि 1222 2575 1.35e23+
बुध सूर्य 57910 2439 3.30e23+
कैलीस्टो बृहस्पति 1883 2400 1.08e23
आयो बृहस्पति 422 1815 8.93e22
चन्द्रमा पृथ्वी 384 1738 7.35e22
युरोपा बृहस्पति 671 1569 4.80e22
ट्राईटन नेपच्युन 355 1353 2.14e22
प्लूटो सूर्य 5913520 1160 1.32e22
  • * नेपच्युन युरेनस से थोड़ा ज्यादा घना है।
  • +बुध गनीमीड तथा टाईटन से ज्यादा घना है।

सबसे घना

11 पिंडो का घनत्व 3 ग्राम/घन सेमी से ज्यादा है।

नाम त्रिज्या (किमी) द्रव्यमान (kg) घनत्व(ग्राम/घन सेमी)
पृथ्वी 6378 5.97e24 5.52
बुध 2439 3.30e23 5.42
शुक्र 6052 4.87e24 5.26
आद्रस्टीआ 10 1.91e16 4.5
मंगल 3398 6.42e23 3.94
आयो 1815 8.93e22 3.53
चन्द्रमा 1738 7.35e22 3.34
एलारा 38 7.77e17 3.3
सीनोपे 18 7.77e16 3.1
लीस्थीआ 18 7.77e16 3.1
युरोपा 1569 4.80e22 3.01

सबसे ज्यादा चमकिला

१२ पिंडो की चमक ६ से ज्यादा है(पृथ्वी के संदर्भ मे), इन्हे नंगी आंखो से या बायनाकुलर से देखा जा सकता है।

नाम मातृ ग्रह/तारा दूरी(000किमी) त्रिज्या(km) Vo*
सूर्य ? 0 697000 -26.8
चन्द्रमा पृथ्वी 384 1738 -12.7
शुक्र सूर्य 108200 6052 -4.4
बृहस्पति सूर्य 778000 71492 -2.7
मंगल सूर्य 227940 3398 -2.0
बुध सूर्य 57910 2439 -1.9
शनि सूर्य 1429000 60268 0.7
गनीमीड बृहस्पति 1070 2631 4.6
आयो बृहस्पति 422 1815 5.0
युरोपा बृहस्पति 671 1569 5.3
युरेनस सूर्य 2870990 25559 5.5
कैलीस्टो बृहस्पति 1883 2400 5.6
दिसम्बर 16, 2010

सूर्य

सूर्य(पूर्णाकार के लिये चित्र पर क्लीक करें)

सूर्य(पूर्णाकार के लिये चित्र पर क्लीक करें)

हमारा सूर्य आकाशगंगा के 100 अरब से अधिक तारो मे से एक सामान्य मुख्य क्रम का  G2 श्रेणी का साधारण तारा है।

व्यास : 1390000 किमी .

द्र्व्यमान : 1.989e30 किलो

तापमान : 5800 डीग्री केल्वीन (सतह)

15600000 डीग्री केल्वीन(केण्द्र)

सूर्य सौर मंडल मे सबसे बड़ा पिण्ड है। सौर मंडल के द्रव्यमान का कुल 99.8%  द्रव्यमान सूर्य का है। बाकि बचे मे अधिकतर में बृहस्पति का द्रव्यमान  है।
यह अक्सर कहा जाता है कि सूर्य एक “साधारण” तारा है। यह इस तरह से सच है कि सूर्य के जैसे लाखों तारे है। लेकिन सूर्य से बड़े तारो की तुलना मे छोटे तारे ज्यादा है। सूर्य  द्रव्यमान से शीर्ष 10% तारो मे है । हमारी आकाशगंगा में सितारों का औसत द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के आधे से भी कम  है।

सूर्य पौराणिक कथाओं में एक मुख्य देवता रहा है, वेदो मे कई मंत्र सूर्य के लिये है, यूनानियों ने इसे हेलियोस(Helios) कहा है और रोमनो ने सोल(Sol)

वर्तमान में सूर्य के द्रव्यमान का 70% हाइड्रोजन 28% हीलियम और 2% अन्य धातु/तत्व है। यह अनुपात धीमे धीमे बदलता है क्योंकि सूर्य हायड्रोजन को जलाकर हिलियम बनाता है।

सूर्य की बाहरी परते भिन्न भिन्न घुर्णन गति दर्शाती है: भूमध्य रेखा पर सतह हर 25.4 दिनों मे एक बार घूमती है ,ध्रुवो के पास यह 36 दिन है। यह अजीब व्यवहार इस तथ्य के कारण है कि सूर्य पृथ्वी के जैसे ठोस नहीं है।  इसी तरह का प्रभाव गैस ग्रहों में देखा जाता है। सूर्य का केन्द्र एक ठोस पिण्ड के जैसे घुर्णन करता है।

सूर्य का केन्द्र(कुल अंतः त्रिज्या का 25%) अपने चरम तापमान पर है; यहां तापमान 15600000 डीग्री केल्विन है और दबाव 250 बिलियन वायुमंडलीय दबाव है।  सूर्य के केंद्र पर घनत्व पानी के घनत्व से 150 गुना से अधिक है।

सूर्य की संरचना

सूर्य की संरचना

सूर्य की शक्ति (386 अरब डॉलर मेगावाट/सेकंड) नाभिकीय संलयन द्वारा निर्मित है। हर सेकंड  700,000,000 टन की हाइड्रोजन 695000000 टन मे परिवर्तित हो जाती है शेष 5,000,000 टन गामा किरणो के रूप मे उर्जा मे परिवर्तित हो जाती है। यह उर्जा जैसे जैसे केंद्र से सतह की तरह बढती है विभिन्न परतो द्वारा अवशोषित हो कर कम तापमान पर उत्सर्जित होती है। सतह पर यह मुख्य रूप मे प्रकाश किरणो के रूप मे उत्सर्जित होती है। इस तरह से केंद्र में निर्मित कुल उर्जा का 20% भाग ही उत्सर्जित होता है।

सूर्य की सतह, जिसे फोटोस्फियर कहा जाता है का तापमान 5800 डेग्री केल्वीन है। सूर्य पर कुछ सूर्य धब्बो के क्षेत्र होते है जिनका तापमान अन्य क्षेत्रो से कुछ कम लगभग 3800 डीग्री केल्वीन होता है। सूर्य धब्बे काफी बड़े हो सकते है, इनका व्यास 5000किमी हो सकता है। सूर्य धब्बे सूर्य के चुंबकिय क्षेत्रो  मे परिवर्तन से बनते है।

फोटोस्फीयर से उपर का क्षेत्र क्रोमोस्फियर कहलाता है। क्रोमोस्फीयर के उपर का क्षेत्र जिसे कोरोना कहते है अंतरिक्ष मे लाखों किमी तक फैला हुआ है। इस क्षेत्र का तापमान 1,000,000 डीग्री केल्वीन तक होता है। यह क्षेत्र केवल सूर्य ग्रहण के समय दिखायी देता है।

पृथ्वी से चंद्रमा और सूर्य एक ही आकार के दिखाई देते है।

पूर्ण सूर्य ग्रहण

पूर्ण सूर्य ग्रहण

चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा उसी प्रतल मे करता है जिस प्रतल मे पृथ्वी सूर्य परिक्रमा करती है। इस कारण कभी कभी चन्द्रमा सूर्य और पृथ्वी के मध्य आ जाता है और सूर्य ग्रहण होता है। यह सूर्य चन्द्रमा और पृथ्वी का एक रेखा मे आना यदि पूर्णतः ना हो तो चन्द्रमा सूर्य को आंशिक रूप से ही ढक पाता है हैं, इसे आंशिक चन्द्रग्रहण कहते है। तिनो खगोलिय पिण्डो के एक रेखा मे होने पर चन्द्रमा सूर्य को पूरी तरह ढक लेता है जिससे पूर्ण सूर्यग्रहण होता है। आंशिक सूर्यग्रहण एक बृहद क्षेत्र मे दिखायी देता है लेकिन पूर्ण सूर्यग्रहण एक बेहद संकरी पट्टी(कुछ किमी) मे दिखायी देता है। हांलांकि यह पट्टी हजारो किमी लम्बी हो सकती है। सूर्यग्रहण साल मे एक या दो बार होता है। पूर्ण सूर्यग्रहण देखना एक अद्भूत अनुभव है जब आप चन्द्रमा की छाया मे खड़े होते है और सूर्य कोरोना देख सकते है। पक्षी इसे रात का समय सोचकर सोने की तैयारी करते है।

सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र बहुत मजबूत है (स्थलीय मानकों के द्वारा) और बहुत जटिल है। इसका हेलीयोस्फियर भी कहते है जो प्लूटो के परे तक फैला हुआ है।

सूर्य, गर्मी और प्रकाश के अलावा इलेक्ट्रान और प्रोटॉन की एक धारा जिसे सौर वायू कहते है का भी उत्सर्जन करता है जो 450किमी/सेकंड की रफ्तार से बहती है। सौर वायु और सौर ज्वाला के द्वारा अधिक उर्जा के कणो का प्र्वाह होता है जिससे पृथ्वी पर बिजली की लाईनो के अलावा संचार उपग्रह और संचार माध्यमो पर प्रभाव पडता है। इसी से ध्रुविय क्षेत्रो मे सुंदर अरोरा बनते है।
अंतरिक्ष यान युलीसीस से प्राप्त आंकड़ो से पता चलता है जब सौर गतिविधी अपने निम्न पर होती है ध्रुवीय क्षेत्रों से प्रवाहित सौर वायू दूगनी गति 750किमी/सेकंड से बहती है जो कि उच्च अक्षांशो मे कम होती है। ध्रुवीय क्षेत्रों से प्रवाहित सौर वायू  की संरचना भी अलग होती है । सौर गतिविधी के चरम पर यह यह अपने मध्यम गति पर बहती है।

सूर्य का निरंतर उर्जा उत्पादन सतत एक मात्रा मे नही होता है, ना ही सूर्य धब्बो की गतिविधियाँ। 17वी शताब्दी के उत्तारार्ध मे सूर्य धब्बे अपने न्युनतम पर थे। इसी समय मे यूरोप मे ठंड अप्रत्याशित रूप से बढ गयी थी। सौर मंडल के जन्म के बाद से सूर्य उर्जा का उत्पादन  40% बढ़ गया है।

मृत्यु

सूर्य 4.5 अरब वर्ष पूराना है , उसने अपने पास की कुल हायड़्रोजन का आधा हिस्सा प्रयोग कर लिया है लेकिन इसके पास अगले 5 अरब वर्षो के लिये पर्याप्त इंधन है। उस समय उसकी चमक लगभग दूगनी हो जायेगी। लेकिन अतत: उसकी हायडोजन खत्म हो जायेगी और वह एक लाल महादानव मे बदल जायेगा। उस समय सूर्य मंगल की कक्षा तक फूल जायेगा। पृथ्वी नष्ट हो जायेगी। शायद सूर्य की मौत एक ग्रहीय निहारिका के रूप मे होगी।

सूर्य के ग्रह
सूर्य के आठ ग्रह हैं और बड़ी संख्या में छोटे पिंड सूर्य की परिक्रमा कर रहे है।

ग्रह दूरीकिमी त्रिज्याकिमी द्रव्यमानकिग्रा आविष्कारक दिनांक
बुध 2439 3.30e23 57910
शुक्र 6052 4.87e24 108200
पृथ्वी 6378 5.98e24 149600
मंगल ग्रह 3397 6.42e23 227940
बृहस्पति 71492 778330 1.90e27
शनि 60268 5.69e26 1426940
यूरेनस 2870990 8.69e25 25559 हर्शेल 1781
नेप्च्यून 4497070 24764 1.02e26 गाले 1846
प्लूटो 5913520 1.31e22 1160 टामबाग 1930
दिसम्बर 16, 2010

सौर मंडल का एक अवलोकन

सौर मंडल मे सूर्य, आठ मुख्य ग्रहों, कम से कम तीन ‘बौने ग्रह‘ , ग्रहों के 130 से अधिक उपग्रहों, बड़ी संख्या में छोटे पिंड(धूमकेतु और क्षुद्रग्रह), और ग्रहों के बीच के माध्यम  का समावेश है। (ध्यान रहे अभी  कई और उपग्रह ऐसे है जिन्हे  अभी तक खोजा नहीं गया है।)

आंतरिक सौर मंडल मे सूर्य , बुध , शुक्र , पृथ्वी और मंगल ग्रह शामिल हैं  :

आंतरिक ग्रह

आंतरिक ग्रह

मुख्य क्षुद्रग्रह पट्टी  बृहस्पति और मंगल ग्रह की कक्षाओं के बीच स्थित हैं(चित्र मे नही दिखाया गयी है)।  बाह्य सौर ग्रहों मे बृहस्पति , शनि , यूरेनस और नेप्च्यून का समावेश है। (ध्यान दे :  प्लूटो  अब एक बौना  ग्रह (Dwarf Planet)के रूप में वर्गीकृत है।)

बाह्य ग्रह

बाह्य ग्रह

सौर मंडल मे अंतरिक्ष ज्यादातर रिक्त(void) है। ग्रहों  के बीच की रिक्त जगह की तुलना करने के लिए ग्रह  बहुत छोटे हैं। यहां तक कि चित्र पर बिन्दू भी ग्रहों के सही आकारों की तुलना मे काफी बड़े है।

कक्षायें

ग्रहों की कक्षायें दिर्घवृत्त(Ellipse) के आकार की है जिसके एक केन्द्र(Focus) मे रवि है, हालांकि बुध की कक्षा लगभग वृताकार है।  सभी ग्रहो की कक्षाये लगभग एक ही प्रतल मे है , जिसे क्रांतिवृत्त कहते है। यह क्रांतिवृत्त पृथ्वी  की कक्षा के प्रतल के द्वारा परिभाषित है (दूसरे शब्दों में क्रांतिवृत्त का प्रतल और पृथ्वी की परिक्रमा का प्रतल एक ही है)। यह क्रांतिवृत्त रवि की भूमध्य रेखा के प्रतल से ७ डिग्री उपर है। चित्र सभी आठ ग्रहों  की कक्षा सापेक्ष आकार मे दर्शाता  है। सभी ग्रह एक ही दिशा (वामावर्त) मे रवि की परिक्रमा करते है। शुक्र, यूरेनस और प्लूटो को छोड़कर सभी ग्रह इसी दिशा मे घूर्णन करते है लेकिन शुक्र, यूरेनस और प्लूटो विपरीत दिशा मे घूर्णन करते है।

ऊपर वाला चित्र अक्टूबर 1996 को सभी ग्रहो की सही स्थिति दर्शाता है।

आकार

तुलनात्मक आकार मे सभी ग्रह (प्लूटो सहित)

तुलनात्मक आकार मे सभी ग्रह (प्लूटो सहित)

ऊपर दिया चित्र  सभी आठ ग्रहों और प्लूटो के तुलनात्मक आकार को दर्शाता है।

सौर मंडल के पिण्डो के तुलनात्मक आकार की कल्पना करने के लिये हमे उन्हे १ अरब गुना छोटा कर देखना होगा।   इस माडल के अनुसार :

  • पृथ्वी का आकार 1.3 सेमी व्यास (अंगूर के दाने के बराबर) का होगा ;
  • चंद्रमा पृथ्वी से 30सेमी दूर होगा;
  • सूर्य 1.5 मीटर व्यास का(मानव की उंचाई के बराबर) और पृथ्वी से 150 मीटर दूरी पर होगा;
  • बृहस्पति 15 सेमी व्यास का(एक बड़े संतरे के आकार का) तथा सूर्य से 750 मीटर दूरी पर होगा;
  • शनि एक संतरे के आकार मे सूर्य से 1500 मीटर दूर तथा
  • यूरेनस और नेपच्यून   नींबु के आकार मे क्रमशः 3 किमी , 4 किमी दूरी पर होंगे।
  • मानव एक परमाणु के बराबर होगा।
  • निकटतम तारा  प्राक्सीमा 4000 किमी पर होगा।

ऊपर के  चित्र मे सौर मण्डल के कई पिण्ड नही दिखाए गये है। इनमे शामिल है,

  • ग्रहो के उपग्रह;
  • क्षुद्रग्रह जो रवि की परिक्रमा कर रहे है (अधिकतर बृहस्पति और मंगल ग्रह की कक्षा के मध्य है);
  • धूमकेतु (छोटे बर्फीले पिंड जो  सौर मंडल मे आते जाते रहते है और उनकी कक्षा  क्रांतिवृत्त से झुकी हुयी होती है) और
  • छोटे क्विपर बेल्ट के बर्फिले पिंड जो नेप्च्यून  से परे है  । कुछ अपवादों को छोड़्कर ग्रहों के उपग्रहों की कक्षा कांतिवृत्त के प्रतल मे ही परिक्रमा करते है लेकिन यह क्षुद्रग्रहों  और धूमकेतु के लिए सच  नहीं है।

ग्रहो के वर्गीकरण मे कई विवाद है। परंपरागत रूप से, सौर प्रणाली को  निम्न वर्गो में विभाजित किया गया है।

  1. ग्रह( सूर्य की परिक्रमा करने वाले बड़े पिंड),
  2. उनके उपग्रह (चन्द्र, विभिन्न आकार के ग्रहों की परिक्रमा करते पिंड),)
  3. क्षुद्रग्रह (छोटे सूर्य की परिक्रमा करते पिंड )और
  4. धूमकेतु (छोटे बर्फीले पिंड जो अत्यधिक अनिश्चित की कक्षाओं मे सूर्य की परिक्रमा करते है)

सौर मंडल काफी जटिल है:

  • यहाँ बुध से बड़े दो चंद्रमा और प्लूटो बड़े कई चन्द्रमा है;
  • यहाँ कई छोटे चन्द्रमा ऐसे है जो  शायद कभी क्षुद्रग्रहों थे और बाद में ग्रहो ने उन्हे अपने गुरुत्वाकषण से बांध लिया;
  • धूमकेतु कभी कभी छोटे हो जाते है और क्षुद्रग्रह जैसे लगते है;
  • क्विपर बेल्ट के पिंडो की तरह  (प्लूटो  और शेरान सहित) इस प्रणाली मे मे अपवाद के जैसे है।
  • पृथ्वी / चंद्रमा युग्म और प्लूटो / शेरान युग्म  को कुछ वैज्ञानिक युग्म ग्रह मानते है।

ग्रहो का वर्गीकरण  रासायनिक संरचना या उत्तपत्ती के स्थान के आधार पर भी किया जा सकता है लेकिन इससे बहुत सारे वर्ग और अपवाद बन जाते है। लब्बोलुआब यह है कि कुछ पिंड अपने आप मे विशेष है और किसी वर्ग मे नही आते है।

आठ मान्य ग्रहों कई तरह से वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • रचना द्वारा:
    • स्थलीय या चट्टानी ग्रह : बुध, शुक्र, पृथ्वी, और मंगल:
      • स्थलीय ग्रहों धातु और चट्टानो से बने है।  इनका अपेक्षाकृत उच्च घनत्व है, धीमी गति से घूर्णन करते है,  इनकी ठोस सतह है, कोई वलय नही है और कम संख्या मे चन्द्रमा है।
    • गैस ग्रह: बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून:
      • आम तौर पर गैस ग्रह मुख्य रूप से हीलियम और हाइड्रोजन के बने हैं और इनका  घनत्व कम है, कई उपग्रह है, तेजी से घूर्णन करते है , गहरा वातावरण है, बहुत सारे वलय है।
  • आकार से:
    • छोटे ग्रह: बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल ग्रह।
      • छोटे ग्रहों जिनका कम से कम व्यास 13000 किमी है ।
    • विशाल ग्रह: बृहस्पति, शनि यूरेनस और नेपच्यून।
      • विशाल ग्रहों  व्यास 48000 किमी  से अधिक है।
    • विशाल ग्रहों  को कभी कभी गैस महादानव भी कहते है।
  • सूर्य के सापेक्ष द्वारा स्थिति:
    • आंतरिक ग्रहों: बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल ग्रह.
    • बाहरी ग्रह: बृहस्पति, शनि, यूरेनस, नेपच्यून.
    • मंगल और बृहस्पति के बीच छोटा क्षुद्रग्रह की पट्टी बाह्य ग्रहो और आंतरिक ग्रहो को अलग करती है।
  • पृथ्वी के सापेक्ष स्थिति के द्वारा :
    • अंदरूनी ग्रह: बुध और शुक्र.
      • पृथ्वी से सूर्य के करीब.
      • अंदरूनी ग्रह की पृथ्वी से चंद्रमा की तरह कला दिखती है।
    • पृथ्वी.
    • बाह्य ग्रह:   मंगल ग्रह से नेपच्यून ग्रह तक .
      • सूर्य से पृथ्वी के आगे.
      • बाह्य ग्रहों हमेशा पूरे दिखाई या लगभग पूरे दिखायी देते है।
  • इतिहास द्वारा :
    • शास्त्रीय ग्रह: बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि
      • ऐतिहासीक काल से ज्ञात ग्रह।
      • नंगी आँख से दिखायी देते है।
      • प्राचीन समय में इसमे सूर्य और चण्द्रमा भी शामिल थे।
    • आधुनिक ग्रह: यूरेनस, नेपच्यून.
      • आधुनिक काल मे खोज।
      • दूरबीन से ही दिखायी देते है।
    • पृथ्वी.
    • IAU के निर्णय के अनुसार शास्त्रीय ग्रहो मे प्लूटो को छोड़ दिया गया है। इस श्रेणी मे अब बुध से लेकर नेप्च्युन तक आठ ही ग्रह है।