ट्राईटन

ट्राईटन

ट्राईटन

यह नेपच्युन का सांतवा ज्ञात और सबसे बड़ा चन्द्रमा  है।

कक्षा : 354,760 किमी नेपच्युन से
व्यास : 2700 किमी
द्रव्यमान : 2.14e22 किग्रा

इसकी खोज लासेल ने 1846मे नेपच्युन की खोज के कुछ सप्ताहो मे की थी।

ग्रीक मिथको मे ट्राईटन सागर का देवता है जो नेपच्युन का पुत्र है; इसे मानव के धड़ और चेहरे लेकिन मछली के पुंछ वाले देवता के रूप मे दर्शाया जाता है।

ट्राईटन के बारे मे हमारी जानकारी वायेजर 2 द्वारा 25अगस्त 1989 की यात्रा मे प्राप्त जानकारी तक सीमीत है।

ट्राईटन विपरित दिशा मे नेपच्युन की परिक्रमा करता है। बड़े चंद्रमाओ मे यह अकेला है जो विपरित दिशा मे परिक्रमा करता है। अन्य विपरित दिशा मे परिक्रमा करने वाले बृहस्पति के चन्द्रमा एनान्के, कार्मे, पासीफे तथा सीनोपे और शनि का चन्द्रमा फोबे ट्राईटन के व्यास के 1/10 भाग से भी छोटे है। अपनी इस विचित्र परिक्र्मा के कारण प्रतित होता है कि ट्राईटन शायद सौर मंडल की मातृ सौर निहारिका से नही बना है। यह कहीं और (काईपर पट्टे) मे बना होगा और बाद मे नेपच्युन के गुरुत्व की चपेट मे आ गया होगा। इस प्रक्रिया मे वह नेपच्युन के किसी चन्द्रमा से टकराया होगा। यह प्रक्रिया नेरेईड की आसामान्य कक्षा के पिछे एक कारण हो सकती है।

अपनी विपरित कक्षा के कारण नेपच्युन और ट्राइटन के मध्य ज्वारिय बंध ट्राईटन की गतिज उर्जा कम कर रहा है जिससे इसकी कक्षा छोटी होते जा रही है। भविष्य मे ट्राईटन टूकड़ो मे बंटकर वलय मे बदल जायेगा या नेपच्युन से टकरा जायेगा। इस समय यह एक कल्पना मात्र है।

ट्राईटन का घुर्णन अक्ष भी विचित्र है। वह नेपच्युन के अक्ष के संदर्भ मे 157 डिग्री झुका हुआ है जबकि नेपच्युन का अक्ष 30 डिग्री झुका हुआ है। कुल मिला कर ट्राईटन का घुर्णन अक्ष युरेनस के जैसे है जिसमे इसके ध्रुव और विषुवत के क्षेत्र एक के बाद एक सूर्य की ओर होते है। इस कारण से इसपर विषम मौसमी स्थिती उत्पन्न होती है। वायेजर 2 की यात्रा के समय इसका दक्षिणी ध्रुव सूर्य की ओर था।

ट्राईटन का घनत्व (2.0) शनि के बर्फिले चन्द्रमाओ जैसे रीआ से ज्यादा है। ट्राईटन मे शायद 25% पानी की बर्फ और शेष चट्टानी पदार्थ है।

वायेजर ने ट्राईटन पर वातावरण पाया था जो कि पतला( 0.01 मीलीबार) है और मुख्यतः नाईट्रोजन तथा कुछ मात्रा मे मिथेन से बना है। एक पतला कोहरा 5 से 10किमी उंचाई तक छाया रहता है।

ट्राईटन की सतह पर तापमान 34.5 डीग्री केल्विन (-235 डीग्री सेल्सीयस) रहता है जो कि प्लूटो के जैसे है। इसकी चमक ज्यादा है(0.7-0.8) जिससे सूर्य की अत्यल्प रोशनी की भी छोटी मात्रा अवशोषित होती है। इस तापमान पर मिथेन, नाईट्रोजन और कार्बन डाय आक्साईड जमकर ठोस बन जाती है।इस पर कुछ ही क्रेटर दिखायी देते है;इसकी सतह नयी है। इसके दक्षिणी गोलार्ध मे नायट्रोजन और मिथेन की बर्फ जमी रहती है।ट्राईटन की सतह पर जटिल पैटर्न मे पर्वत श्रेणी और घाटीयां है जो कि शायद पिघलने/जमने के प्रक्रिया के कारण है।

ट्राईटन की सतह पर इसके ज्वालामुखी द्वारा उत्सर्जित नायट्रोजन के प्रवाह से बनी धारियां

ट्राईटन की सतह पर इसके ज्वालामुखी द्वारा उत्सर्जित नायट्रोजन के प्रवाह से बनी धारियां

ट्राईटन की दूनिया मे सबसे विचित्र इसके बर्फिले ज्वालामुखी है। इनसे निकलनेवाला पदार्थ द्रव नाईट्रोजन, धूल और मिथेन के यौगिक है। वायेजर के एक चित्र मे एक ज्वालामुखी(हिममुखी) सतह से 8 किमी उंचा और 140 किमी चौड़ा है।

ट्राईटन, आयो, शुक्र और पृथ्वी सौर मंडल मे सक्रिय ज्वालामुखी वाले पिंड है। मंगल पर भूतकाल मे ज्वालामुखी थे। यह भी एक विचित्र तथ्य है कि पृथ्वी और शुक्र (मंगल भी )के ज्वालामुखी चट्टानी पदार्थ उत्सर्जित करते है और अंदरूनी गर्मी द्वारा चालित है, जबकि आयो के ज्वालामुखी गंधक या गंधक के यौगिक उत्सर्जित करते है और बृहस्पति के ज्वारिय बंध द्वारा चालित है, वहीं ट्राईटन के ज्वालामुखी नाईट्रोजन या मिथेन उत्सर्जित करते है तथा सूर्य द्वारा प्रदान मौसमी उष्णता से चालित है।

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